Supreme Court Verdict: शादीशुदा बेटियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब अनुकंपा नियुक्ति से नहीं किया जा सकेगा वंचित

नई दिल्ली। देश में बेटियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विवाहित बेटी को केवल शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति या अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह किसी बेटी का अपने माता-पिता के परिवार से संबंध समाप्त नहीं करता और केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करना संविधान की भावना के विपरीत है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले से जुड़ा है। ग्राम पंचायत आरियावां में उचित दर की दुकान का संचालन बदरू निशा के नाम पर था। 4 मार्च 2024 को उनके निधन के बाद उनकी बेटी कुलसुम ने आश्रित कोटे के तहत दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया। हालांकि, प्रशासन ने उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह विवाहित हैं और उत्तर प्रदेश आवश्यक वस्तु आदेश, 2016 तथा 2019 के सरकारी आदेश के अनुसार परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं होतीं।

इसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा। पहले हाईकोर्ट में सुनवाई हुई, जहां प्रशासन के निर्णय को नियमों के अनुरूप माना गया। लेकिन कुलसुम ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामले की विस्तृत सुनवाई हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सभी विवाहित बेटियों को एक समान आधार पर अयोग्य ठहराना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने माना कि यह मान लेना कि हर विवाहित बेटी अपने माता-पिता के परिवार से पूरी तरह अलग हो जाती है, एक गलत धारणा है।

पीठ ने कहा कि यदि किसी मामले में अलग निवास या अन्य पात्रता संबंधी शर्तें लागू होती हैं तो उनकी जांच अलग से की जा सकती है, लेकिन केवल विवाह को आधार बनाकर किसी बेटी के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।

विवाह से नहीं टूटता परिवार से रिश्ता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवाह किसी बेटी का अपने माता-पिता के परिवार के साथ संबंध खत्म नहीं करता। बेटा चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसे परिवार का सदस्य माना जाता है, जबकि बेटी को केवल शादी के कारण परिवार से बाहर मान लेना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा देती है और संविधान द्वारा प्रदत्त समान अधिकारों का उल्लंघन करती है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 को मिली मजबूती

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून के समक्ष समानता और लिंग के आधार पर भेदभाव न करने का सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना है। किसी विवाहित बेटी को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के कारण सरकारी लाभों से वंचित करना मनमाना और असंवैधानिक है।

फैसले का व्यापक असर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल अनुकंपा नियुक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभिन्न सरकारी योजनाओं, आश्रित कोटे, पारिवारिक लाभों और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। इससे देशभर में विवाहित बेटियों के अधिकारों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है, जिन्हें अब तक केवल शादीशुदा होने के कारण कई सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ता था। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महिलाओं की समान भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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