
थायरॉइड से जुड़ी बीमारियां आजकल काफी आम हो चुकी हैं, लेकिन इनमें से कुछ ऐसी भी हैं जो धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती हैं और लंबे समय तक पहचान में नहीं आ पातीं। ऐसी ही एक बीमारी है हाशिमोटो थायरॉइडिटिस (Hashimoto’s Thyroiditis)। यह दुनिया में हाइपोथायरायडिज्म यानी थायरॉइड हार्मोन की कमी का सबसे सामान्य कारण मानी जाती है। खास बात यह है कि यह समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कई गुना अधिक देखी जाती है।
हाशिमोटो थायरॉइडिटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अपनी ही थायरॉइड ग्रंथि की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगता है। धीरे-धीरे थायरॉइड ग्रंथि कमजोर होने लगती है और शरीर के लिए जरूरी थायरॉइड हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है।
महिलाओं में हाशिमोटो थायरॉइडिटिस का खतरा ज्यादा क्यों होता है?
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, महिलाओं में हाशिमोटो थायरॉइडिटिस पुरुषों की तुलना में करीब 7 से 10 गुना ज्यादा पाई जाती है। इसके पीछे कई जैविक और हार्मोनल कारण जिम्मेदार माने जाते हैं।
महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन इम्यून सिस्टम की गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण से लड़ने में अधिक सक्रिय होती है, लेकिन कई बार यही सक्रियता शरीर के अपने अंगों के खिलाफ प्रतिक्रिया शुरू कर सकती है।
यही वजह है कि हाशिमोटो थायरॉइडिटिस के अलावा रूमेटाइड अर्थराइटिस और लूपस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियां भी महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती हैं। गर्भावस्था, बच्चे के जन्म के बाद का समय और मेनोपॉज के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
क्या है Hashimoto’s Thyroiditis और शरीर पर कैसे डालती है असर?
हाशिमोटो थायरॉइडिटिस एक क्रोनिक ऑटोइम्यून डिजीज है। इस बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम थायरॉइड ग्रंथि को बाहरी खतरा समझने लगता है और उसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाने लगता है।
ये एंटीबॉडी धीरे-धीरे थायरॉइड की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके कारण थायरॉइड हार्मोन का निर्माण कम होने लगता है और आगे चलकर हाइपोथायरॉइडिज्म की समस्या हो सकती है।
इस बीमारी की शुरुआत अक्सर धीमी होती है। कई लोगों को शुरुआती दौर में कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते, लेकिन समय के साथ थायरॉइड की कार्यक्षमता कम होने लगती है और शरीर में कई बदलाव दिखाई देने लगते हैं।
किन कारणों से विकसित होती है यह ऑटोइम्यून बीमारी?
विशेषज्ञों के मुताबिक हाशिमोटो थायरॉइडिटिस किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि कई कारकों के मिलकर काम करने से इसका खतरा बढ़ता है।
आनुवंशिक कारण (Genetic Predisposition)
अगर परिवार में थायरॉइड या किसी अन्य ऑटोइम्यून बीमारी का इतिहास रहा है तो हाशिमोटो थायरॉइडिटिस होने की संभावना बढ़ सकती है।
इसके अलावा कुछ अन्य कारण भी इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकते हैं:
- महिलाओं में होने वाले हार्मोनल बदलाव
- अत्यधिक आयोडीन का सेवन (कुछ मामलों में)
- वायरल संक्रमण
- सेलेनियम और विटामिन डी की कमी
- पर्यावरण से जुड़े कुछ कारक
डॉक्टरों का मानना है कि जिन लोगों में आनुवंशिक रूप से ऑटोइम्यून बीमारी की संवेदनशीलता होती है, उनमें कुछ बाहरी कारण इम्यून सिस्टम को सक्रिय कर सकते हैं।
हाशिमोटो थायरॉइडिटिस के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार, इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। शुरुआत में सामान्य थकान जैसी समस्या महसूस हो सकती है, जिसे कई बार लोग नजरअंदाज कर देते हैं।
इसके कुछ सामान्य संकेत इस प्रकार हैं:
- लगातार थकान महसूस होना
- बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन बढ़ना
- सामान्य से ज्यादा ठंड लगना
- बालों का अधिक झड़ना
- त्वचा का रूखा और बेजान होना
- सुस्ती और कमजोरी महसूस होना
- ध्यान लगाने में परेशानी होना
- कब्ज की समस्या होना
समय रहते जांच और इलाज क्यों जरूरी है?
हाशिमोटो थायरॉइडिटिस का समय पर पता लगाना जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक थायरॉइड हार्मोन की कमी शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित कर सकती है। डॉक्टर आमतौर पर थायरॉइड फंक्शन टेस्ट और कुछ विशेष एंटीबॉडी टेस्ट के जरिए इसकी पहचान करते हैं।
अगर किसी महिला को लंबे समय तक थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना या ठंड ज्यादा लगने जैसी समस्या बनी रहती है तो उसे डॉक्टर से सलाह लेकर थायरॉइड की जांच करानी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी भी बीमारी की पुष्टि या इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
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