समुद्र में भारत की दहाड़: DRDO और नौसेना ने दागीं ‘स्वदेशी’ एंटी-शिप मिसाइलें, दुश्मन के जहाजों का बचना अब नामुमकिन

नई दिल्ली/ओडिशा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते हुए भारत ने आज एक और स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भारतीय नौसेना ने स्वदेशी ‘नेवल एंटी-शिप मिसाइल-शॉर्ट रेंज’ (NASM-SR) का बंगाल की खाड़ी में सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण की सबसे खास बात इसका ‘सल्वो लॉन्च’ रहा, जहां एक ही हेलीकॉप्टर से पलक झपकते ही दो मिसाइलें दागकर दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं दिया गया।

वॉटरलाइन हिट: दुश्मन के जहाज का होगा जलसमाधि

ओडिशा के चांदीपुर तट के पास हुए इस परीक्षण में मिसाइलों ने अपनी अचूक सटीकता का लोहा मनवाया। मिसाइल ने लक्ष्य पर ‘वॉटरलाइन हिट’ किया, जिसका मतलब है कि इसने पानी की सतह के बिल्कुल करीब प्रहार किया। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, वॉटरलाइन पर होने वाला हमला किसी भी युद्धपोत के लिए सबसे घातक होता है क्योंकि इससे जहाज में तेजी से पानी भरता है और वह तुरंत डूबने की स्थिति में आ जाता है।

स्वदेशी तकनीक का बेजोड़ संगम

NASM-SR मिसाइल पूरी तरह से भारतीय प्रतिभा का परिणाम है। इसमें अत्याधुनिक ‘सॉलिड बूस्टर’ और लंबी दूरी तक मार करने वाला शक्तिशाली इंजन लगा है। मिसाइल को रास्ता दिखाने के लिए इसमें ‘फाइबर-ऑप्टिक जायरॉस्कोप’ आधारित नेविगेशन और ‘रेडियो एल्टीमीटर’ जैसे स्मार्ट कंट्रोल सिस्टम लगाए गए हैं। साथ ही, इसमें हाई-स्पीड दोतरफा डेटा लिंक मौजूद है, जिससे कमांड सेंटर पल-पल की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

हेलीकॉप्टर से दागी गईं दो मिसाइलें

यह परीक्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे एक नौसैनिक हेलीकॉप्टर से अंजाम दिया गया। सल्वो लॉन्च तकनीक का सफल होना यह दर्शाता है कि भारतीय नौसेना अब समुद्र के ऊपर से एक साथ कई मिसाइलें दागकर दुश्मन की घेराबंदी करने में सक्षम है। चांदीपुर टेस्ट रेंज के अत्याधुनिक रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम ने मिसाइल के पूरे सफर को ट्रैक किया और सभी मानकों पर इसे सफल पाया।

रक्षा मंत्री और DRDO प्रमुख ने दी बधाई

इस बड़ी कामयाबी पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और DRDO के अध्यक्ष समीर वी. कामत ने वैज्ञानिकों और नौसेना की टीम की पीठ थपथपाई। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह सफलता भारत की समुद्री सुरक्षा को अभेद्य बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। इस मिसाइल के निर्माण में डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के साथ-साथ निजी उद्योगों और स्टार्टअप्स ने भी अहम भूमिका निभाई है।

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