बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की बढ़त से भारत की बढ़ी चिंता, 3000 KM दूर बैठे संकट का तेल से एक्सपोर्ट तक दिख सकता है असर

यमन के लाल सागर तट पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की तेजी से बढ़ती मौजूदगी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास हूतियों की पकड़ मजबूत होने से वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की आशंका है। भारत से करीब 3,000 किलोमीटर दूर चल रहा यह घटनाक्रम अगर लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर भारतीय तेल आयात, शिपिंग लागत और यूरोप को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है।

बाब-अल-मंदेब इतना अहम क्यों है?

बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसके जरिए जहाज सुएज नहर के रास्ते यूरोप और एशिया के बीच आवाजाही करते हैं। यही वजह है कि इस समुद्री गलियारे में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में रुकावट वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है।

भारत के लिए इसकी अहमियत और ज्यादा है, क्योंकि कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा दवाइयां, मशीनरी, टेक्सटाइल और कई अन्य सामान इसी व्यापक समुद्री नेटवर्क के जरिए यूरोपीय बाजारों तक पहुंचते हैं।

मायून द्वीप और मोखा पर हूतियों की बढ़त

ताजा घटनाक्रम में हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की है। रिपोर्टों के मुताबिक रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर हूतियों ने कब्जा किया है और मायून यानी पेरिम द्वीप पर भी उनका नियंत्रण स्थापित हुआ है। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदेब के दक्षिणी हिस्से में बेहद रणनीतिक स्थिति रखता है।

रिपोर्टों में हूती नेतृत्व की ओर से बाब-अल-मंदेब पर नियंत्रण का दावा भी सामने आया है। हालांकि ईरान ने हूतियों को नई मदद देने और अपने अधिकारियों को यमन भेजने संबंधी खबरों का खंडन किया है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम में जमीन पर वास्तविक नियंत्रण और राजनीतिक दावों के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

भारत के तेल आयात पर कैसे पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। बाब-अल-मंदेब के रास्ते से गुजरने वाले तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की मात्रा पहले काफी ज्यादा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2023 में इस रास्ते से करीब 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का आवागमन हुआ था, जो 2025 की पहली छमाही में घटकर करीब 4.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया।

हूती हमलों और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे के कारण पहले ही कई जहाजों को वैकल्पिक लंबे रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ा है। अगर बाब-अल-मंदेब से आवाजाही और ज्यादा जोखिम भरी होती है, तो जहाजों के संचालन, बीमा और ईंधन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर अंततः वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है।

ताजा घटनाक्रम के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार भी गई। बाद में इसमें कुछ नरमी आई, लेकिन बाजार में सप्लाई बाधित होने का जोखिम बना हुआ है।

रूस से तेल खरीदने पर भी भारत पूरी तरह सुरक्षित नहीं

भारत के पास तेल आयात के लिए कई स्रोत मौजूद हैं और रूस जैसे देशों से खरीद बढ़ाकर किसी एक समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम की जा सकती है। लेकिन वैश्विक तेल बाजार में कीमत बढ़ने का असर सिर्फ उस देश पर नहीं पड़ता जहां से तेल सीधे खरीदा जा रहा है।

अगर मध्य पूर्व में सप्लाई को लेकर बड़ा जोखिम पैदा होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत को भी ऊंची कीमत चुकानी पड़ सकती है। यानी बाब-अल-मंदेब में संकट का असर भारत तक पहुंचने के लिए जरूरी नहीं कि भारतीय जहाज सीधे इसी रास्ते से गुजरें।

यूरोप को भारत का एक्सपोर्ट भी हो सकता है महंगा

संकट का दूसरा बड़ा असर भारत के यूरोप के साथ व्यापार पर पड़ सकता है। अगर लाल सागर और सुएज नहर वाले रास्ते से जहाजों की आवाजाही जोखिम भरी हो जाती है, तो कंपनियां अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होकर केप ऑफ गुड होप वाले लंबे मार्ग का इस्तेमाल कर सकती हैं।

पहले भी हूती हमलों के बाद बड़ी संख्या में जहाजों ने सुएज नहर से बचने के लिए लंबा रास्ता चुना था। इससे यात्रा का समय, ईंधन खर्च और बीमा लागत बढ़ी थी।

भारत से यूरोप जाने वाले माल के लिए इसका सीधा मतलब ज्यादा लॉजिस्टिक्स लागत हो सकता है। मुंबई से रॉटरडैम जैसे प्रमुख व्यापारिक रूट पर वैकल्पिक अफ्रीकी मार्ग अपनाने की स्थिति में दूरी लगभग 15,700 किलोमीटर से बढ़कर करीब 23,000 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। इससे तेल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद किया है। रॉयटर्स के मुताबिक यह पाइपलाइन हाल के महीनों में रोजाना करीब 4 से 5 मिलियन बैरल तेल ले जा रही थी, यानी भारतीय उत्पादों की यूरोपीय बाजार में पहुंच महंगी और धीमी हो सकती है।

पहले होर्मुज, अब बाब-अल-मंदेब ने बढ़ाई चिंता

पश्चिम एशिया में पहले से ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव बना हुआ है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों समुद्री मार्गों पर एक साथ दबाव बढ़ना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

सऊदी अरब ने भी क्षेत्रीय तनाव के बीच अपनी महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद किया है। रॉयटर्स के मुताबिक यह पाइपलाइन हाल के महीनों में रोजाना करीब 4 से 5 मिलियन बैरल तेल ले जा रही थी, यानी वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 4 से 5 प्रतिशत।

ऐसे समय में बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की बढ़ती पकड़ ने ऊर्जा बाजार की चिंता और बढ़ा दी है। यह सिर्फ यमन या सऊदी अरब का क्षेत्रीय संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर तेल की कीमतों, समुद्री बीमा, वैश्विक शिपिंग और एशिया-यूरोप व्यापार तक फैल सकता है।

भारत के लिए असली खतरा क्या है?

भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम किसी एक जहाज के फंसने से ज्यादा वैश्विक लागत बढ़ने का है। तेल महंगा हुआ तो ऊर्जा आयात का बिल बढ़ सकता है। शिपिंग महंगी हुई तो आयातित सामान की लागत बढ़ेगी। यूरोप जाने वाले भारतीय उत्पादों की ढुलाई महंगी हुई तो निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव आएगा।

यानी यमन में चल रही यह हलचल भारत से हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अप्रत्यक्ष खतरा पैदा कर सकती है। अगर बाब-अल-मंदेब लंबे समय तक असुरक्षित रहता है, तो भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा, शिपिंग और एक्सपोर्ट—तीनों मोर्चों पर चुनौती बढ़ सकती है।

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