
Nepal Flood: नेपाल में आई बाढ़ और आपदा के बीच भारत और चीन की मानवीय मदद को लेकर मुकाबले की स्थिति बनने की आशंका थी, लेकिन बालेन सरकार ने इस बार बेहद सतर्क और संतुलित कूटनीति का परिचय दिया है। नेपाल ने भारत और चीन के बीच खुद को किसी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बनने से रोकने की कोशिश की है। खास बात यह है कि काठमांडू ने दोनों पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्तों को ध्यान में रखते हुए ऐसा संतुलन साधा, जिससे चीन को नेपाल में अपनी बढ़त दिखाने का आसान मौका नहीं मिला।
2015 की त्रासदी ने नेपाल को दिया बड़ा सबक
नेपाल के लिए आपदा के दौरान भारत और चीन की भूमिका कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद दोनों देशों ने बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाए थे। उस समय भारत ने ऑपरेशन मैत्री शुरू करते हुए सैन्य विमान और हेलीकॉप्टर नेपाल भेजे थे। इसके साथ ही मेडिकल टीमों और बचावकर्मियों को भी राहत कार्यों में लगाया गया था।
दूसरी ओर, चीन ने भी उस आपदा के बाद बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता उपलब्ध कराई थी। बीजिंग की ओर से चलाया गया अभियान उसके सबसे बड़े विदेशी मानवीय राहत अभियानों में शामिल रहा। उस अनुभव ने नेपाल को यह समझने का मौका दिया कि प्राकृतिक आपदा के समय मिलने वाली मदद कई बार क्षेत्रीय कूटनीति और रणनीतिक प्रभाव से भी जुड़ जाती है।
इस बार नेपाल ने दिखाई ज्यादा सतर्कता
मौजूदा हालात में नेपाल ने पहले की परिस्थितियों से सबक लेते हुए अधिक सावधानी बरती है। बालेन सरकार की कोशिश रही कि देश में आई आपदा भारत और चीन के बीच प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा का माध्यम न बन जाए। नेपाल की यही संतुलित नीति उसे दोनों पड़ोसी शक्तियों के बीच एक संवेदनशील स्थिति में फंसने से बचाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।
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