
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए विशेष माना जाता है। सावन समाप्त होते ही धार्मिक वातावरण का स्वरूप भी बदलने लगता है। भाद्रपद यानी भादौ के महीने में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण, गणेशजी और सप्तऋषियों की पूजा का विशेष महत्व सामने आता है। यही वजह है कि इस महीने मंदिरों और घरों में अलग-अलग धार्मिक पर्वों और जयघोषों की गूंज सुनाई देती है।
भादौ हिंदू पंचांग के महत्वपूर्ण महीनों में शामिल है। इस महीने में जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और ऋषि पंचमी जैसे प्रमुख पर्व आते हैं। इन त्योहारों की धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन सभी का संबंध भारतीय सनातन परंपरा, आस्था और आध्यात्मिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
सावन में शिवभक्ति के बाद भादौ में क्यों बदल जाता है धार्मिक माहौल?
सावन का मुख्य केंद्र भगवान शिव की उपासना रहती है। श्रावण मास में शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा है। सोमवार के व्रत और शिव मंदिरों में विशेष पूजा के कारण पूरे महीने शिवभक्ति का वातावरण बना रहता है।
इसके बाद भाद्रपद मास शुरू होने पर धार्मिक कैलेंडर में कई महत्वपूर्ण तिथियां आती हैं। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है, जबकि शुक्ल पक्ष में गणेश चतुर्थी का पर्व आता है। इसी अवधि में ऋषि पंचमी भी मनाई जाती है। इस तरह भादौ में अलग-अलग देवी-देवताओं और ऋषि परंपरा से जुड़े पर्वों का क्रम दिखाई देता है।
भादौ में क्यों होता है भगवान श्रीकृष्ण का जयघोष?
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी पर मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
इस अवसर पर भक्त भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर झांकियां सजाई जाती हैं और कृष्ण जन्म से जुड़े प्रसंगों का मंचन भी किया जाता है। मध्यरात्रि में जन्मोत्सव के समय श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाते हैं। यही वजह है कि सावन के बाद भादौ में धार्मिक आयोजनों के बीच ‘जय श्रीकृष्ण’ का उद्घोष प्रमुखता से सुनाई देता है।
गणेश चतुर्थी से गूंज उठते हैं गणपति बप्पा के जयकारे
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेशजी की पूजा करने की परंपरा भारतीय धार्मिक जीवन में लंबे समय से चली आ रही है।
गणेश चतुर्थी पर घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। कई जगहों पर उत्सव कई दिनों तक चलता है और विसर्जन के दौरान ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
इस पर्व का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह सामूहिक उत्सव, श्रद्धा और सामाजिक सहभागिता का भी प्रतीक बन चुका है।
ऋषि पंचमी में क्यों याद किए जाते हैं सप्तऋषि?
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। यह पर्व हिंदू परंपरा में ऋषियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने से जुड़ा है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा का विधान बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं में सप्तऋषियों को ज्ञान, तप, धर्म और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला माना गया है। ऋषि पंचमी के अवसर पर श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करते हैं और ऋषि परंपरा का स्मरण करते हैं। इसलिए भादौ के धार्मिक पर्वों में भगवान कृष्ण और गणेशजी के साथ ऋषियों का जयघोष भी अपनी अलग पहचान रखता है।
भादौ को धार्मिक दृष्टि से क्यों माना जाता है खास?
भाद्रपद मास की खासियत यह है कि इसमें भक्ति के अलग-अलग स्वरूप देखने को मिलते हैं। एक ओर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में जन्माष्टमी आती है, तो दूसरी ओर भगवान गणेश की आराधना का प्रमुख पर्व गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। इसके साथ ऋषि पंचमी जैसी परंपरा ज्ञान और ऋषि संस्कृति के प्रति सम्मान का संदेश देती है।
यानी सावन जहां मुख्य रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है, वहीं भादौ धार्मिक विविधता और कई महत्वपूर्ण पर्वों के कारण विशेष बन जाता है। यही कारण है कि सावन के बाद भी मंदिरों, घरों और धार्मिक आयोजनों में भक्ति का उत्साह कम नहीं होता, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है।
भक्ति के अलग-अलग रूपों को जोड़ता है भाद्रपद
भारतीय पंचांग में प्रत्येक मास की अपनी धार्मिक विशेषता बताई गई है। भाद्रपद में आने वाले प्रमुख पर्व भगवान कृष्ण की लीलाओं, गणेशजी की आराधना और ऋषि परंपरा के स्मरण से जुड़े हैं। इस कारण यह महीना धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है।
सावन में जहां शिवभक्त ‘हर हर महादेव’ के जयकारे लगाते हैं, वहीं भादौ में ‘जय श्रीकृष्ण’, ‘गणपति बप्पा मोरया’ और ऋषि परंपरा से जुड़े जयघोष सुनाई देते हैं। यही बदलाव हिंदू धार्मिक कैलेंडर की विविधता और पर्व-परंपराओं की निरंतरता को दर्शाता है।
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