
रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्योहार से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी के प्रसंग से लेकर देवराज इंद्र और इंद्राणी की कथा तक रक्षाबंधन के महत्व को समझाने वाली कई कहानियां मिलती हैं। इन्हीं में एक बेहद रोचक कथा दैत्यराज राजा बली और माता लक्ष्मी से जुड़ी है। मान्यता है कि इसी प्रसंग में माता लक्ष्मी ने राजा बली की कलाई पर राखी बांधी थी।
जब भगवान विष्णु को पाताल लोक में रहना पड़ा
पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज राजा बली भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक समय देवराज इंद्र और राजा बली के बीच युद्ध हुआ। इंद्र बली को पराजित नहीं कर सके, जिसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान विष्णु ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया।
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बली को पाताल लोक का राज्य सौंप दिया। साथ ही उन्हें अमरता का वरदान भी मिला। बली की सुरक्षा के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं पाताल लोक में रहने का वचन दिया और वहां उनकी रक्षा करने लगे।
पति के पाताल लोक जाने से चिंतित हुईं माता लक्ष्मी
भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने के बाद माता लक्ष्मी चिंतित हो उठीं। वह चाहती थीं कि भगवान विष्णु जल्द से जल्द वैकुंठ वापस लौटें। लेकिन भगवान विष्णु राजा बली को दिए अपने वचन के कारण पाताल लोक में ही रह रहे थे।
माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लाने का उपाय सोचा। इसके लिए उन्होंने एक ब्राह्मणी का रूप धारण किया और राजा बली के पास पहुंच गईं।
ब्राह्मणी बनकर राजा बली के महल पहुंचीं लक्ष्मी जी
कथा के मुताबिक, माता लक्ष्मी ने राजा बली से कहा कि उनके पति किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं और जब तक वह वापस नहीं आते, तब तक वह उनकी शरण में रहना चाहती हैं। राजा बली ने ब्राह्मणी के इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
राजा बली ने उन्हें सम्मान दिया और अपने परिवार के सदस्य की तरह उनका ख्याल रखा। इस तरह माता लक्ष्मी कुछ समय तक बली के यहां रहने लगीं।
श्रावण पूर्णिमा पर बांधी राखी
जब श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन आया, तब माता लक्ष्मी ने राजा बली की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी राखी बांधी। उन्होंने बली के सुख, समृद्धि और लंबी आयु की कामना की।
राखी बंधवाने के बाद राजा बली ने माता लक्ष्मी को अपनी बहन मान लिया। उन्होंने परंपरा के अनुसार बहन से उपहार मांगने के लिए कहा। तब माता लक्ष्मी ने अपना असली परिचय राजा बली को बताया।
बहन की बात सुनकर राजा बली ने दिया वचन
माता लक्ष्मी ने राजा बली को बताया कि वह भगवान विष्णु की पत्नी हैं और उनके पति पाताल लोक में उनके साथ रहने के कारण वैकुंठ से दूर हैं। वह चाहती हैं कि भगवान विष्णु उनके साथ वापस वैकुंठ लौटें।
कथा के अनुसार, राजा बली ने माता लक्ष्मी की इच्छा का सम्मान किया और भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस तरह राखी का यह प्रसंग भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और वचन निभाने की भावना को दर्शाता है।
रक्षाबंधन पर क्यों सुनाई जाती है यह कथा?
राजा बली और माता लक्ष्मी की यह पौराणिक कथा रक्षाबंधन के धार्मिक महत्व को विशेष रूप से दर्शाती है। इसमें राखी को केवल एक धागे के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सुरक्षा और रिश्ते के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।
रक्षाबंधन के अवसर पर इस कथा का श्रवण या कथन करने की परंपरा कई जगहों पर देखने को मिलती है। यह प्रसंग यह संदेश भी देता है कि राखी का रिश्ता केवल जन्म से बने भाई-बहन तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वास और आत्मीयता से भी मजबूत हो सकता है।
Raksha Bandhan Story: जानें इस कथा का धार्मिक संदेश
रक्षाबंधन से जुड़ी राजा बली और माता लक्ष्मी की कथा में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और दैत्यराज बली के बीच भक्ति, वचन और पारिवारिक संबंधों का अनूठा प्रसंग सामने आता है। यही वजह है कि रक्षाबंधन के मौके पर इस कथा को महत्वपूर्ण धार्मिक प्रसंगों में गिना जाता है।
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