
ढाका: बांग्लादेश में इन दिनों एक अहम विदेश नीति को लेकर बहस तेज है। सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की से जुड़े प्रस्तावित ‘इस्लामिक नाटो’ यानी मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का हिस्सा बनना चाहिए? इसी मुद्दे पर बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ मो. शरीफुल इस्लाम ने तारिक रहमान की सरकार को बेहद सावधानी से फैसला लेने की सलाह दी है। उनका कहना है कि विदेश नीति से जुड़े फैसले भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों, राष्ट्रीय हित और ठोस विश्लेषण के आधार पर लिए जाने चाहिए।
‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने से पहले सावधानी क्यों जरूरी?
राजशाही यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस पढ़ाने वाले मो. शरीफुल इस्लाम ने इस पूरे मामले को ‘रैशनल एक्टर मॉडल’ के नजरिए से देखने की बात कही है। उनके मुताबिक किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय समझौते में शामिल होने से पहले यह देखना चाहिए कि उससे देश के दीर्घकालिक हितों को कितना फायदा या नुकसान हो सकता है।
उन्होंने बांग्लादेश के लिए भी इसी सोच को अपनाने की सलाह दी है। उनका तर्क है कि मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने का फैसला भावनात्मक आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसके संभावित रणनीतिक, कूटनीतिक और राष्ट्रीय हितों से जुड़े असर का सावधानीपूर्वक आकलन जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल- क्या भारत से भी भिड़ेगा बांग्लादेश?
मक्का समझौते को लेकर उठाए जा रहे सवालों में सबसे अहम मुद्दा इसकी सामूहिक रक्षा की अवधारणा है। एक्सपर्ट ने इस पहलू पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तरह का सैन्य संघर्ष होता है, तो क्या बांग्लादेश भी इस समझौते के तहत भारत के खिलाफ खड़ा होने के लिए मजबूर होगा?
दरअसल, इस समझौते से जुड़ी जिस अवधारणा का हवाला दिया गया है, उसके मुताबिक एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में बांग्लादेश के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि किसी संभावित भारत-पाकिस्तान टकराव की स्थिति में उसकी भूमिका क्या होगी।
बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर
मो. शरीफुल इस्लाम का कहना है कि बांग्लादेश को किसी भी सैन्य या रणनीतिक गठजोड़ का हिस्सा बनने से पहले अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके मुताबिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी देश का फैसला भावनाओं के बजाय व्यावहारिक गणना और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।
इसी आधार पर उन्होंने बांग्लादेश सरकार को मक्का पैक्ट में शामिल होने से पहले पांच प्रमुख कारणों पर गंभीरता से विचार करने की सलाह दी है। उनका निष्कर्ष है कि मौजूदा परिस्थितियों में इस समझौते का हिस्सा बनना बांग्लादेश के सर्वोत्तम हित में न भी हो सकता है।
तारिक रहमान सरकार के सामने बड़ा फैसला
अब इस मुद्दे पर निगाहें तारिक रहमान की सरकार के रुख पर हैं। बांग्लादेश के भीतर जहां ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल होने को लेकर चर्चा चल रही है, वहीं विशेषज्ञ इसे देश की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक हितों के संदर्भ में देखने की अपील कर रहे हैं।
इस बहस का एक अहम पहलू भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध भी हैं। यदि भविष्य में किसी क्षेत्रीय सैन्य संकट में गठबंधन के सदस्य देशों से एक-दूसरे के समर्थन की अपेक्षा की जाती है, तो बांग्लादेश की विदेश नीति पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ समझौते में शामिल होने से पहले इसके हर संभावित परिणाम का आकलन करने की सलाह दे रहे हैं
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