
क्या आपके दिमाग में भी कोई पुरानी बातचीत बार-बार चलती रहती है? कभी किसी गलती को याद करके मन में आता है कि काश उस समय कुछ और कहा या किया होता। कई बार भविष्य में होने वाली किसी घटना की चिंता भी दिमाग में इतनी जगह बना लेती है कि चाहकर भी उससे ध्यान हटाना मुश्किल हो जाता है। अगर यह कभी-कभार होता है तो इसे सामान्य मानसिक प्रक्रिया माना जा सकता है, लेकिन जब एक ही विचार बार-बार लौटकर ध्यान, नींद, काम और मानसिक शांति को प्रभावित करने लगे, तो यह Repetitive Thinking यानी बार-बार सोचते रहने की स्थिति हो सकती है।
क्या है Repetitive Thinking?
Repetitive Thinking का मतलब किसी विचार, घटना, समस्या या चिंता के बारे में बार-बार उसी तरह सोचते रहना है, जबकि उस सोच से कोई नया समाधान सामने नहीं आ रहा हो। दिमाग एक ही सवाल, घटना या नकारात्मक विचार को दोहराता रहता है और व्यक्ति को लगता है कि शायद लगातार सोचते रहने से कोई जवाब मिल जाएगा। इसका एक आम रूप Rumination यानी किसी बीती घटना, गलती या नकारात्मक भावना को बार-बार याद करते रहना है।
उदाहरण के लिए, किसी से हुई पुरानी बहस को बार-बार याद करना और यह सोचना कि उस समय मुझे ऐसा जवाब देना चाहिए था, या आने वाले समय को लेकर लगातार यह आशंका करना कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। ऐसी सोच कई बार व्यक्ति को समस्या का हल खोजने के बजाय उसी विचार के घेरे में फंसा देती है।
कब बार-बार सोचना परेशानी बन जाता है?
हर बार किसी बात पर ज्यादा विचार करना मानसिक समस्या नहीं है। किसी महत्वपूर्ण फैसले से पहले उसके अलग-अलग पहलुओं पर विचार करना स्वाभाविक है। परेशानी तब बढ़ सकती है जब सोचने का सिलसिला रुकने का नाम न ले और व्यक्ति एक ही बात को बार-बार दोहराता रहे।
अगर लगातार सोचने की वजह से नींद प्रभावित हो रही है, काम या पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा, रोजमर्रा के कामों में मन नहीं लग रहा या छोटी-छोटी बातों को लेकर लगातार तनाव महसूस हो रहा है, तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी है। Repetitive Thinking को चिंता और अवसाद जैसी कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ा पाया गया है। हालांकि, केवल बार-बार सोचने की आदत का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा है।
दिमाग में चल रहे विचारों का चक्र कैसे तोड़ें?
सबसे पहले यह पहचानने की कोशिश करें कि आप किसी समस्या का समाधान तलाश रहे हैं या सिर्फ उसी विचार को दोहरा रहे हैं। अगर कई मिनट या घंटों तक सोचने के बाद भी कोई नया समाधान सामने नहीं आ रहा है, तो विचारों से थोड़ा अंतर बनाना मददगार हो सकता है।
अपना ध्यान किसी ऐसे काम में लगाएं जिसमें आपका दिमाग वर्तमान गतिविधि पर केंद्रित हो। टहलना, किसी पसंदीदा गतिविधि में समय देना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बातचीत करना या कुछ देर शांत वातावरण में बैठना विचारों के चक्र से बाहर निकलने में मदद कर सकता है।
विचारों को लिखना भी हो सकता है मददगार
बार-बार दिमाग में घूम रही बातों को कागज पर लिखना एक उपयोगी तरीका हो सकता है। जो विचार लगातार परेशान कर रहा है, उसे लिखें और फिर खुद से पूछें कि इसमें मेरे नियंत्रण में क्या है और क्या नहीं। इससे समस्या को ज्यादा स्पष्ट तरीके से देखने में मदद मिल सकती है।
अगर किसी समस्या का समाधान संभव है, तो उसके लिए छोटे-छोटे व्यावहारिक कदम तय किए जा सकते हैं। लेकिन जिन चीजों पर आपका नियंत्रण नहीं है, उनके बारे में बार-बार सोचते रहना तनाव को बढ़ा सकता है। ऐसे में ध्यान को वर्तमान और अपने नियंत्रण वाली गतिविधियों की ओर लाना उपयोगी हो सकता है।
खुद से पूछें ये सवाल
जब कोई विचार बार-बार लौटे तो खुद से पूछें—क्या इस समय इसके बारे में सोचने से कोई समाधान निकल रहा है? क्या मैं किसी वास्तविक समस्या को हल कर रहा हूं या पुरानी घटना को दोहरा रहा हूं? क्या इस स्थिति में कुछ ऐसा है जिसे मैं अभी बदल सकता हूं?
इन सवालों के जवाब आपको यह समझने में मदद कर सकते हैं कि आपकी सोच Problem Solving की दिशा में जा रही है या केवल Rumination का हिस्सा बन रही है।
कब विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है?
अगर बार-बार आने वाले विचार लंबे समय तक बने रहते हैं और आपकी नींद, काम, पढ़ाई, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी को लगातार प्रभावित कर रहे हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उचित हो सकता है। खासकर तब जब चिंता या उदासी लगातार बनी रहे और खुद से किए गए प्रयासों के बावजूद स्थिति में सुधार न हो।
याद रखें, हर विचार को खत्म करना जरूरी नहीं है। लक्ष्य यह समझना है कि विचार कब उपयोगी है और कब वह आपको एक ही मानसिक चक्र में फंसा रहा है। इस अंतर को पहचानकर और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेकर Repetitive Thinking के असर को कम करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है।
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