
दिल्ली में ब्लड सेफ्टी को मजबूत करने के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलियरी साइंसेज यानी ILBS ने एक अहम पहल की है। यहां अत्याधुनिक NAT तकनीक के जरिए रक्तदाताओं के खून की जांच की जा रही है।
इस तकनीक से HIV और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों की शुरुआती चरण में पहचान करने में मदद मिलती है। खास बात यह है कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में ILBS फिलहाल व्यक्तिगत रक्तदाता की NAT जांच करने वाला एकमात्र अस्पताल है।
मरीजों को सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराने की दिशा में ILBS की यह पहल अहम मानी जा रही है। संस्थान में जनवरी 2024 में शुरू हुई NAT जांच सुविधा के तहत अब तक 30 हजार से अधिक रक्तदाताओं के नमूनों की जांच की जा चुकी है। यह तकनीक HIV-1, HIV-2, हेपेटाइटिस-B और हेपेटाइटिस-C जैसे संक्रमणों की पहचान में मदद करती है।
NAT तकनीक की सबसे बड़ी खासियत है संक्रमण की जल्द पहचान।
पारंपरिक जांच के मुकाबले यह तकनीक वायरस के जेनेटिक मटेरियल का पता संक्रमण के शुरुआती चरण में ही लगा सकती है।
ILBS के आंकड़ों के मुताबिक, HIV-1 के लिए संक्रमण की पहचान की अवधि 15 दिन से घटकर करीब साढ़े चार दिन रह जाती है।
वहीं, हेपेटाइटिस-C के मामले में यह अवधि 58.3 दिन से घटकर 2.2 दिन और हेपेटाइटिस-B के मामले में 38.3 दिन से घटकर 16.3 दिन हो जाती है।इससे रक्त चढ़ाने के जरिए संक्रमण फैलने के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
इस सुविधा के लिए ILBS में अत्याधुनिक NAT प्रयोगशाला स्थापित की गई है। यहां लगी Procleix Panther प्रणाली की क्षमता 24 घंटे संचालन के आधार पर एक महीने में 36 हजार तक जांच करने की है। इस प्रयोगशाला को इस तरह तैयार किया गया है कि यह दिल्ली सरकार के सभी ब्लड सेंटरों की NAT जांच संबंधी जरूरतों को भी पूरा कर सके।
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