
तेल अवीव। गाजा युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया दावे ने इजराइल की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। ट्रम्प ने 30 जुलाई को कहा कि गाजा को लेकर एक “ऐतिहासिक समझौता” हो चुका है और हमास हथियार डालने के लिए तैयार हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समझौते के तहत इजराइली सेना गाजा से पीछे हट सकती है।
हालांकि, ट्रम्प के इस दावे के बाद इजराइल के भीतर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार पर एक ओर अमेरिका के साथ तालमेल बनाए रखने का दबाव है, तो दूसरी ओर घरेलू राजनीति और कट्टरपंथी सहयोगी दल गाजा से सेना हटाने के किसी भी फैसले का खुलकर विरोध कर रहे हैं। ऐसे में चुनाव से पहले नेतन्याहू के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।
ट्रम्प के दावे के बाद उठे कई सवाल
डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया कि हमास हथियार छोड़ने पर सहमत हो गया है और इसी के साथ गाजा में युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है। उनके इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठने लगा कि क्या इजराइल वास्तव में गाजा से अपनी सेना वापस बुलाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रम्प ने समझौते को लेकर सकारात्मक तस्वीर पेश की, वहीं इजराइल सरकार की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इससे अटकलों का दौर और तेज हो गया है।
इजराइल सरकार का संकेत- हथियार छोड़े बिना वापसी नहीं
रिपोर्टों के मुताबिक, इजराइली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि जब तक यह पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि हमास ने स्थायी रूप से हथियार छोड़ दिए हैं, तब तक गाजा से इजराइली सेना की वापसी पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।
इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि इजराइल फिलहाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है और किसी भी जल्दबाजी में सेना हटाने के पक्ष में नहीं है।
गाजा से सेना हटाने का इतना विरोध क्यों?
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद से गाजा में भारी तबाही हुई और बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। इसके बावजूद इजराइल के भीतर बड़ी आबादी अब भी मानती है कि हमास के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहनी चाहिए।
हाल में सामने आए एक सर्वे के अनुसार बड़ी संख्या में यहूदी इजराइली नागरिक गाजा के प्रति सख्त नीति का समर्थन करते हैं। ऐसे में सेना की वापसी और फिलिस्तीनी प्रशासन की संभावित बहाली को लेकर देश के भीतर गंभीर असहमति दिखाई दे रही है।
कई लोगों का मानना है कि यदि इजराइली सेना गाजा से हट जाती है तो हमास दोबारा संगठित होकर भविष्य में फिर बड़े हमले कर सकता है। यही आशंका सरकार के भीतर भी कई नेताओं की राय को प्रभावित कर रही है।
सरकार के कई मंत्री भी वापसी के खिलाफ
इजराइल की सत्तारूढ़ सरकार के कई प्रभावशाली मंत्री पहले भी गाजा में भविष्य में यहूदी बस्तियां बसाने की वकालत कर चुके हैं। उनका मानना है कि सैन्य नियंत्रण बनाए रखना ही इजराइल की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए जरूरी है।
इसी कारण गाजा से सेना हटाने और पुनर्निर्माण की किसी भी योजना का सरकार के भीतर ही विरोध बढ़ता नजर आ रहा है।
वित्त मंत्री स्मोट्रिच ने रखा सख्त रुख
इजराइल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने स्पष्ट कहा है कि गाजा से इजराइली सेना की वापसी नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि सबसे पहले हमास को पूरी तरह निरस्त्र किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में पूरे गाजा पर इजराइल का नियंत्रण होना चाहिए और वहां फिर से यहूदी बस्तियां बसाई जानी चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री भी विरोध में
राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्विर भी गाजा से सेना हटाने के प्रस्ताव के विरोधियों में शामिल हैं। उनका मानना है कि हमास के पूरी तरह समाप्त हुए बिना किसी भी प्रकार की सैन्य वापसी इजराइल की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
चुनाव से पहले नेतन्याहू की बढ़ीं मुश्किलें
इजराइल में आगामी चुनाव करीब हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सरकार के सहयोगी दल और देश के भीतर सख्त सुरक्षा नीति का समर्थन करने वाले वर्ग को भी संतुष्ट रखना होगा।यदि गाजा से सेना हटाने का फैसला आगे बढ़ता है तो इससे नेतन्याहू की गठबंधन सरकार पर भी असर पड़ सकता है। वहीं यदि समझौता टलता है तो अमेरिका के साथ राजनीतिक समीकरण प्रभावित होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
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