Supreme Court Verdict: पत्नी के अफेयर के मिले प्रथम दृष्टया सबूत तो नहीं मिलेगा मेंटेनेंस, 92 वीडियो वाले केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। पत्नी के भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) का आरोप लगाता है और शुरुआती स्तर पर उसके समर्थन में विश्वसनीय एवं प्रथम दृष्टया ठोस साक्ष्य पेश कर देता है, तो ऐसी स्थिति में पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता (Interim Maintenance) देने से इनकार किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि केवल अंतिम फैसले तक इंतजार करना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें कहा गया था कि व्यभिचार के आरोपों पर अंतिम निर्णय होने तक पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों का भी मूल्यांकन करना चाहिए।

धारा 125(4) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कही महत्वपूर्ण बात

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के तहत यदि पत्नी के व्यभिचार में लिप्त होने की बात साबित हो जाती है तो वह न केवल अंतिम बल्कि अंतरिम भरण-पोषण की भी पात्र नहीं रहती। इसलिए यदि पति प्रारंभिक चरण में ही ऐसे साक्ष्य पेश कर देता है, जिनसे आरोप पहली नजर में सही प्रतीत हों, तो अदालत अंतरिम मेंटेनेंस रोक सकती है।

सिर्फ आरोप नहीं, मजबूत सबूत भी जरूरी

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल व्यभिचार का आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। पति को ऐसे विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य अदालत के सामने रखने होंगे, जिनसे प्रथम दृष्टया आरोप सही दिखाई दें। अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त सबूत के किसी महिला को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

अंतिम सुनवाई तक इंतजार करना जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने यह मानकर गलती की कि व्यभिचार के आरोपों पर फैसला केवल अंतिम सुनवाई के दौरान ही किया जा सकता है। अदालत के अनुसार, यदि ऐसा माना जाए तो कानून में दिए गए प्रावधानों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए प्रारंभिक स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

92 वीडियो और कई तस्वीरें बने केस का अहम आधार

इस मामले में पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ अदालत में कई तस्वीरें और 92 वीडियो साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए। इन डिजिटल साक्ष्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संभवतः इन्हें किसी निजी जासूस (Private Investigator) की सहायता से एकत्र किया गया होगा।

प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों पर भी सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निजी जांच एजेंसियों के बढ़ते उपयोग पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि ऐसे संस्थानों के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है, ताकि नागरिकों की निजता और कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।

फैसले का क्या होगा असर?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में भरण-पोषण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अब अदालतें केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि शुरुआती स्तर पर पेश किए गए साक्ष्यों की गंभीरता को भी ध्यान में रखकर अंतरिम मेंटेनेंस पर फैसला कर सकेंगी।

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