Parikrama in Hinduism: क्यों की जाती है परिक्रमा और क्या हैं इसके धार्मिक नियम?
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और उपासना की परंपराओं का विशेष महत्व माना गया है। इन्हीं धार्मिक विधियों में परिक्रमा या प्रदक्षिणा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी कर्म बताया गया है। मान्यता है कि भगवान, पवित्र नदियों, तीर्थस्थलों और पूजनीय वृक्षों की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार परिक्रमा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और आस्था का प्रतीक भी है।
परिक्रमा का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा का मुख्य उद्देश्य भगवान को अपने जीवन का केंद्र मानना है। जिस प्रकार संपूर्ण ग्रह-नक्षत्र सूर्य के चारों ओर भ्रमण करते हैं, उसी प्रकार भक्त अपने आराध्य के प्रति सम्मान और समर्पण प्रकट करने के लिए उनकी परिक्रमा करते हैं।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि परिक्रमा के दौरान उठाया गया प्रत्येक कदम व्यक्ति के संचित पापों को कम करने में सहायक होता है। यही कारण है कि मंदिरों और तीर्थस्थलों पर श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ प्रदक्षिणा करते दिखाई देते हैं।
किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?
हिंदू धर्मग्रंथों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या भी अलग निर्धारित की गई है।
भगवान विष्णु और उनके अवतार
भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण सहित उनके अवतारों की चार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
भगवान गणेश और हनुमान जी
विघ्नहर्ता भगवान गणेश और संकटमोचन हनुमान जी की तीन परिक्रमा करने का विधान बताया गया है। इससे बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है।
भगवान शिव की परिक्रमा
भगवान शिव की पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती। धार्मिक परंपरा के अनुसार शिवलिंग की आधी परिक्रमा सोमसूत्र तक की जाती है। इसे ही शास्त्रसम्मत माना गया है।
मां दुर्गा और अन्य देवियां
माता दुर्गा तथा देवी स्वरूपों की एक परिक्रमा करने का विधान बताया गया है। इसे शक्ति और कृपा प्राप्ति का माध्यम माना जाता है।
परिक्रमा करते समय इन नियमों का रखें ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा यानी दाईं ओर से करनी चाहिए। इसे दक्षिणावर्त परिक्रमा कहा जाता है। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु को यथासंभव मौन रहना चाहिए और भगवान के नाम का स्मरण या मंत्र जाप करना चाहिए।
इसके अलावा स्नान के बाद शुद्ध अवस्था में और संभव हो तो नंगे पैर परिक्रमा करना अधिक शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
केवल मंदिर ही नहीं, इन स्थानों की परिक्रमा का भी है विशेष महत्व
परिक्रमा की परंपरा केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। हिंदू धर्म में कई पवित्र पर्वतों, नदियों और धार्मिक स्थलों की परिक्रमा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
गोवर्धन, कामतानाथ और नर्मदा परिक्रमा
ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लाखों श्रद्धालु करते हैं। इसी प्रकार चित्रकूट स्थित कामतानाथ परिक्रमा और नर्मदा नदी परिक्रमा को भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इन धार्मिक यात्राओं से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ के साथ जीवन की अनेक बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
तुलसी और पीपल की परिक्रमा
हिंदू धर्म में तुलसी और पीपल के वृक्षों को भी अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन वृक्षों की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
निष्कर्ष
परिक्रमा हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक परंपरा है, जो श्रद्धा, समर्पण और ईश्वर के प्रति विश्वास को प्रकट करती है। शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करते हुए की गई परिक्रमा न केवल धार्मिक दृष्टि से लाभकारी मानी जाती है, बल्कि व्यक्ति को मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करती है।
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