Iran Mosaic Defense: ‘मोजैक’ जाल में फंसेंगे दुश्मन? 4 दिन में थकान के संकेत, ट्रंप के लिए ‘नरक’ बन सकता है शिया देश

तेहरान/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया की तपती ज़मीन पर जंग का समीकरण तेजी से बदल रहा है। ईरान ने दावा किया है कि उसने अमेरिका के खिलाफ अपनी बहुचर्चित ‘मोजैक डिफेंस’ रणनीति पूरी तरह सक्रिय कर दी है। जानकारों का कहना है कि यह वही मॉडल है, जिसने अतीत में बड़े सैन्य गठबंधनों को लंबी लड़ाई में उलझाकर थका दिया था। चार दिन की टकराहट में ही दबाव बढ़ने की चर्चा है और अगर हालात जमीनी युद्ध तक पहुंचे, तो यह टकराव पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकता है।

क्या है ईरान की ‘मोजैक डिफेंस’ रणनीति?

ईरान ने अपनी सैन्य संरचना को केंद्रीकृत कमान से हटाकर विकेंद्रीकृत मॉडल में ढाल दिया है। इस ढांचे के तहत Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के प्रांतीय कमांडरों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अब किसी ऑपरेशन के लिए शीर्ष नेतृत्व से तत्काल मंजूरी अनिवार्य नहीं होगी।

सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय कमांड, सैन्य ठिकानों और संचार तंत्र पर हमलों के बाद यह बदलाव तेज किया गया। रणनीति का मकसद साफ है—अगर शीर्ष नेतृत्व निशाने पर आए, तब भी युद्ध मशीनरी थमे नहीं।

31 यूनिट में बंटी ताकत, हर कमांडर ‘स्वतंत्र’

मोजैक मॉडल के तहत IRGC को 31 हिस्सों में बांटा गया है—एक तेहरान के लिए और 30 अलग-अलग प्रांतों के लिए। हर यूनिट का कमांडर सामरिक फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। वह तय कर सकता है कि ड्रोन तैनात करने हैं, मिसाइल दागनी है या गुरिल्ला हमले करने हैं।

यह ढांचा ‘डिफेंस इन डेप्थ’ सिद्धांत पर आधारित है—यानी दुश्मन को देश के भीतर गहराई तक खींचकर उसकी ताकत को धीरे-धीरे क्षीण करना। ऊबड़-खाबड़ पहाड़, रेगिस्तान और शहरी बस्तियां इस रणनीति का हिस्सा हैं। सैन्य विशेषज्ञ इसे वियतनाम और अफगानिस्तान में देखी गई थकाऊ जंग की तर्ज पर तैयार मॉडल बता रहे हैं।

लंबी जंग में फंसाने की तैयारी?

ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे स्वाभाविक बढ़त देती है। हमलावर देशों को हजारों किलोमीटर दूर से रसद और सैनिक भेजने होंगे, जबकि ईरानी बल अपने इलाके में फैले रहेंगे। इससे सप्लाई लाइन पर दबाव और लागत दोनों बढ़ेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी जंग किसी भी बाहरी ताकत के लिए राजनीतिक और आर्थिक बोझ बन जाती है। ऐसे में तेज और निर्णायक जीत की संभावना घटती जाती है, जबकि स्थानीय बल छोटे-छोटे हमलों से विरोधी को लगातार परेशान करते रहते हैं।

असली मकसद: थकाकर तोड़ देना

रणनीति का केंद्रीय विचार है—हमलावर को थका देना। घात लगाकर हमला, संचार बाधित करना, व्यापारिक मार्गों को अस्थायी रूप से प्रभावित करना और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना—ये सब ‘मोजैक’ का हिस्सा हैं। अचानक हमलों से तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय व्यापार पर असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल में कहा था कि लड़ाई “कब और कैसे खत्म होगी”, यह तय करने की क्षमता तेहरान के पास है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने की कोशिश भी है।

क्या जमीनी दखल के बिना संभव है बदलाव?

रणनीतिक हलकों में चर्चा है कि केवल हवाई हमलों से किसी देश में सत्ता परिवर्तन कराना बेहद कठिन होता है। जब तक जमीनी सैनिक तैनात न हों, शासन व्यवस्था को पूरी तरह बदलना लगभग असंभव माना जाता है। ऐसे में अगर टकराव बढ़ता है, तो यह संघर्ष लंबा और बहुस्तरीय हो सकता है।

अब नजर इस बात पर है कि क्या ‘मोजैक डिफेंस’ दो शक्तिशाली सैन्य ताकतों को उलझा पाएगा या फिर तीव्र जवाबी कार्रवाई से यह मॉडल दबाव में आ जाएगा। पश्चिम एशिया की यह जंग सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगी—इसके असर ऊर्जा बाजार, कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा समीकरण तक दिख सकते हैं।

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