पेरिस/नई दिल्ली। दुनिया की सैन्य ताकतों के बीच अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की दौड़ तेज होती जा रही है। इसी बीच राफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान बनाने वाले फ्रांस ने बड़ा रणनीतिक फैसला लेते हुए घोषणा की है कि वह अब अपने दम पर छठी पीढ़ी का फाइटर जेट विकसित करेगा। जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर चल रहे FCAS (फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम) कार्यक्रम से अलग होने के बाद फ्रांस ने यह कदम उठाया है। इस फैसले को यूरोप की रक्षा रणनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
FCAS प्रोग्राम में बढ़े मतभेद, फ्रांस ने चुना अलग रास्ता
यूरोप का महत्वाकांक्षी FCAS प्रोग्राम फ्रांस, जर्मनी और स्पेन की साझेदारी में विकसित किया जा रहा था। इसका उद्देश्य वर्ष 2040 तक छठी पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तैयार करना था। हालांकि परियोजना में हिस्सेदारी, तकनीकी नियंत्रण और औद्योगिक नेतृत्व को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए थे। आखिरकार ये मतभेद इतने बढ़ गए कि फ्रांस ने इस संयुक्त कार्यक्रम से अलग होकर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का फैसला कर लिया।
फ्रांस के रक्षा मंत्री ने संसद में किया बड़ा ऐलान
फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉटरीन ने संसद में स्पष्ट किया कि देश पिछले आठ वर्षों से इस परियोजना में निवेश कर रहा था और अब तक लगभग 2.5 अरब यूरो खर्च किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह निवेश व्यर्थ नहीं जाएगा और फ्रांस 2040 तक अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास पर काम जारी रखेगा। उनके बयान से संकेत मिला है कि फ्रांस अब अपनी रक्षा तकनीक और सैन्य स्वायत्तता को प्राथमिकता देना चाहता है।
जर्मनी भी नई साझेदारी की तलाश में
फ्रांस के अलग होने के बाद जर्मनी ने भी अपने विकल्पों पर काम शुरू कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार जर्मन एयरोस्पेस कंपनी एयरबस समेत आठ कंपनियां मिलकर एक नया कंसोर्टियम बनाने जा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास को जारी रखना है। माना जा रहा है कि यह नया समूह FCAS परियोजना की जगह लेने की कोशिश करेगा और यूरोप में रक्षा तकनीक के नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फ्रांस का यह फैसला?
फ्रांस और भारत के रक्षा संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। भारतीय वायुसेना के लिए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद और नौसेना के लिए होने वाले संभावित रक्षा सौदों ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई दी है। ऐसे में फ्रांस के स्वतंत्र छठी पीढ़ी के फाइटर जेट कार्यक्रम में भारत की संभावित भागीदारी को लेकर चर्चाएं तेज हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फ्रांस अपने नए कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय सहयोगी तलाशता है तो भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है। भारत पहले से ही एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) परियोजना पर काम कर रहा है और दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं।
वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और जापान पहले से ही छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकास पर तेजी से काम कर रहे हैं। अब फ्रांस के अकेले मैदान में उतरने से वैश्विक रक्षा उद्योग में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि फ्रांस अपनी नई परियोजना को कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है और क्या भारत इसमें किसी भूमिका के साथ शामिल होता है।
फिलहाल इतना तय है कि FCAS कार्यक्रम के टूटने के बाद यूरोपीय रक्षा क्षेत्र में नई समीकरण बन रही हैं और इसका असर वैश्विक सैन्य संतुलन पर भी देखने को मिल सकता है।
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