घी को लेकर सालों से जो डर था, क्या वह गलत साबित हो रहा है? नई रिसर्च ने बदल दी दिल की सेहत से जुड़ी सोच

घी खाने से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है? इस सवाल को लेकर लंबे समय से लोगों के बीच डर बना हुआ है। खासकर उन लोगों में, जो सब्जी या दाल में एक चम्मच देसी घी डालना पसंद करते हैं। वर्षों से यह धारणा बनाई जाती रही कि घी में मौजूद सैचुरेटेड फैट दिल की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े इस पूरी तस्वीर को कुछ अलग तरीके से देखने का संकेत दे रहे हैं।

हमारे देश में घी का इस्तेमाल सदियों से भोजन का हिस्सा रहा है। पुराने समय में इसे ताकत और ऊर्जा देने वाला खाद्य पदार्थ माना जाता था। हालांकि, बाद के वर्षों में सैचुरेटेड फैट और हृदय रोग के बीच संबंध को लेकर हुई चर्चाओं के बाद घी को लेकर भी लोगों की सोच बदलने लगी। कई लोगों को यह तक लगने लगा कि घी का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और हार्ट अटैक का जोखिम भी बढ़ सकता है।

लेकिन क्या घी को लेकर बनी यह धारणा पूरी तरह सही है? हालिया शोध और उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है।

घी खाने को लेकर लोगों के मन में क्यों बैठ गया डर?

न्यूट्रिशनिस्ट और हेल्थ कोच के अनुभव के मुताबिक, आज भी बड़ी संख्या में लोग घी को लेकर पुरानी धारणाओं के कारण असहज रहते हैं। कई बार लोग भोजन में सिर्फ एक चम्मच घी इस्तेमाल करने को भी ऐसी आदत मानते हैं, जिसे छोड़ देना चाहिए।

दरअसल, घी को लेकर बना डर काफी हद तक सैचुरेटेड फैट से जुड़ी पुरानी वैज्ञानिक चेतावनियों से निकला। 1950 के दशक में वैज्ञानिक एंसेल कीज के काम के बाद सैचुरेटेड फैट और हृदय रोग के संबंध पर बड़े स्तर पर चर्चा शुरू हुई। इसके बाद दुनिया भर की पोषण संबंधी नीतियों और लोगों की खानपान संबंधी सोच पर इसका प्रभाव पड़ा।

घी में सैचुरेटेड फैट की मात्रा होने के कारण इसे भी उसी श्रेणी में रखकर देखा जाने लगा। धीरे-धीरे यह संदेश लोगों तक पहुंचा कि सैचुरेटेड फैट वाला भोजन दिल के लिए खराब है और घी से दूरी बनाना बेहतर है।

क्या हर सैचुरेटेड फैट का असर एक जैसा होता है?

यहीं से घी को लेकर नई बहस शुरू होती है। सैचुरेटेड फैट को लेकर हुई शुरुआती चर्चाओं में कई अलग-अलग खाद्य पदार्थों को एक ही नजर से देखने का खतरा रहा। लेकिन किसी खाद्य पदार्थ का स्वास्थ्य पर असर सिर्फ उसमें मौजूद एक पोषक तत्व से तय नहीं होता।

किसी व्यक्ति की पूरी डाइट, वह कितनी मात्रा में किसी खाद्य पदार्थ का सेवन करता है और उसकी जीवनशैली कैसी है, ये सभी चीजें स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए केवल इस आधार पर कि घी में सैचुरेटेड फैट मौजूद है, हर व्यक्ति के लिए इसके सेवन को समान रूप से नुकसानदायक मानना उचित नहीं माना जा सकता।

नई रिसर्च में क्या सामने आया?

इस साल Progress in Nutrition में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस में 10 शोधों और करीब 20,000 लोगों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें घी के सेवन और कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी हृदय की धमनियों से जुड़ी बीमारी के बीच संबंध का अध्ययन किया गया।

विश्लेषण में घी का सेवन करने वाले लोगों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के जोखिम में मामूली बढ़ोतरी देखी गई। हालांकि, दूसरी ओर उनके औसत कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड स्तर में कोई स्पष्ट औसत बदलाव नहीं पाया गया।

यही बात घी को लेकर पुरानी धारणा को अधिक बारीकी से समझने की जरूरत बताती है।

कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड में बदलाव क्यों अहम है?

अगर किसी खाद्य पदार्थ का सेवन सीधे तौर पर रक्त में लिपिड प्रोफाइल को प्रभावित करता है, तो सामान्य तौर पर उसके असर को कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड जैसे संकेतकों में भी देखा जा सकता है। लेकिन उपलब्ध विश्लेषण में घी खाने वालों के औसत कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड स्तर में ऐसा स्पष्ट बदलाव नहीं मिला।

इसका अर्थ यह नहीं है कि घी को बिना किसी सीमा के खाना पूरी तरह सुरक्षित साबित हो गया है। बल्कि इससे यह संकेत मिलता है कि घी और हृदय रोग के बीच संबंध को समझने के लिए सिर्फ सैचुरेटेड फैट की मौजूदगी को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है।

क्या अब घी को लेकर पुरानी चेतावनी खत्म मान लें?

नई जानकारी सामने आने के बाद भी घी को लेकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। शोध में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के जोखिम में मामूली बढ़ोतरी का संकेत भी मिला है। इसलिए इसे घी के पक्ष में पूरी तरह से अंतिम फैसला मानना सही नहीं होगा।

घी का असर इस बात से भी जुड़ा हो सकता है कि कोई व्यक्ति कितनी मात्रा में इसे खा रहा है और उसकी पूरी डाइट कैसी है। अगर किसी की डाइट में पहले से ही ज्यादा कैलोरी, सैचुरेटेड फैट और अन्य असंतुलित खाद्य पदार्थ शामिल हैं, तो घी को अलग करके उसके प्रभाव का आकलन करना मुश्किल हो सकता है।

एक चम्मच घी और ज्यादा मात्रा में घी खाने में फर्क

घी के सेवन को लेकर सबसे जरूरी बात मात्रा हो सकती है। भोजन में थोड़ी मात्रा में घी का इस्तेमाल करना और रोजाना बड़ी मात्रा में घी का सेवन करना एक जैसी स्थिति नहीं है।

इसीलिए किसी भी व्यक्ति को केवल नई रिसर्च के आधार पर अपनी डाइट में अचानक बहुत अधिक घी शामिल नहीं करना चाहिए। संतुलित भोजन, कुल फैट का सेवन, शारीरिक गतिविधि और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर ही डाइट तय करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

घी को लेकर क्या समझना चाहिए?

घी को लेकर वर्षों से चली आ रही धारणा और नई रिसर्च को आमने-सामने रखने पर तस्वीर पहले की तुलना में ज्यादा जटिल नजर आती है। उपलब्ध नए आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि घी को केवल सैचुरेटेड फैट की श्रेणी में रखकर उसके प्रभाव के बारे में एक सीधा निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है।

हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि घी खाने से दिल की बीमारी का कोई जोखिम हो ही नहीं सकता। नए मेटा-एनालिसिस में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के जोखिम में मामूली बढ़ोतरी देखी गई है। इसलिए घी को लेकर सही संदेश यह है कि इसे न तो अनावश्यक रूप से डरावना खाद्य पदार्थ मानें और न ही इसे स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित मानकर जरूरत से ज्यादा सेवन करें।

सबसे अहम बात व्यक्ति की पूरी डाइट और घी की मात्रा है। पुरानी चेतावनियों को नई रिसर्च के साथ पढ़ना जरूरी है, ताकि घी को लेकर डर या अति-विश्वास के बजाय वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर फैसला लिया जा सके।

Check Also

रीठा-आंवला से घर पर बनाएं नेचुरल शैंपू, महंगे प्रोडक्ट्स पर खर्च करने की जरूरत नहीं; जानें आसान तरीका

अगर बालों का झड़ना, रूखापन और डैंड्रफ जैसी समस्याएं आपको परेशान कर रही हैं, तो …