डायबिटीज आज दुनिया भर में तेजी से फैलने वाली गंभीर बीमारियों में शामिल हो चुकी है। यह केवल ब्लड शुगर बढ़ाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शरीर के कई जरूरी अंगों को भी धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है। इन्हीं जटिल समस्याओं में एक है डायबिटिक न्यूरोपैथी। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने से नसें कमजोर और डैमेज होने लगती हैं। शुरुआत में इसके संकेत सामान्य लग सकते हैं, लेकिन समय रहते ध्यान न दिया जाए तो व्यक्ति के चलने-फिरने और रोजमर्रा की गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
क्या है डायबिटिक न्यूरोपैथी?
डायबिटिक न्यूरोपैथी डायबिटीज से जुड़ी एक गंभीर नर्व संबंधी समस्या है। शरीर की नसें दर्द, तापमान, स्पर्श और अन्य संकेतों को दिमाग तक पहुंचाने का काम करती हैं। जब खून में ग्लूकोज का स्तर लंबे समय तक ज्यादा बना रहता है, तो यह नसों पर बुरा प्रभाव डालता है और उनकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
इस बीमारी में सबसे ज्यादा असर पैरों, टांगों, हाथों और बाहों की नसों पर देखा जाता है। कई मरीजों को झुनझुनी, जलन, सुन्नपन या तेज दर्द महसूस होने लगता है। कुछ मामलों में यह समस्या पाचन तंत्र, हार्ट रेट और शरीर की अन्य आंतरिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती है।
क्यों होता है डायबिटिक न्यूरोपैथी?
विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटिक न्यूरोपैथी का सबसे बड़ा कारण लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर है। नसों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए ऑक्सीजन और पोषण की जरूरत होती है, जो शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं से मिलता है। लगातार हाई शुगर इन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जिससे नसों तक पर्याप्त पोषण नहीं पहुंच पाता।
इसके अलावा कई अन्य कारण भी इस समस्या को बढ़ाते हैं। हाई ब्लड शुगर नसों में सूजन पैदा कर सकता है। शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ने से केशिकाएं कमजोर होने लगती हैं। इससे नसों के सिग्नल भेजने की क्षमता प्रभावित होती है और उनकी बाहरी सुरक्षा परत भी कमजोर पड़ने लगती है। धीरे-धीरे यह स्थिति नसों को स्थायी नुकसान तक पहुंचा सकती है।
डायबिटिक न्यूरोपैथी में कैसे डैमेज होती हैं नसें?
डायबिटिक न्यूरोपैथी अचानक विकसित नहीं होती। यह एक धीमी प्रक्रिया है, जो समय के साथ गंभीर रूप लेती है। शुरुआती चरण में इसके लक्षण बेहद हल्के हो सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोग इन्हें सामान्य कमजोरी या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
लगातार हाई शुगर रहने पर नसों की रक्त आपूर्ति प्रभावित होती है। नसों तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते। इससे नसों की कोशिकाएं कमजोर होने लगती हैं और उनका सामान्य कार्य प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि मरीजों को पैरों में सुन्नपन, जलन, चुभन या संवेदना कम होने जैसी समस्याएं महसूस होने लगती हैं।
किन लोगों को ज्यादा रहता है खतरा?
डॉक्टरों के मुताबिक जिन लोगों का ब्लड शुगर लंबे समय तक कंट्रोल में नहीं रहता, उनमें डायबिटिक न्यूरोपैथी का खतरा अधिक होता है। इसके अलावा मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और लंबे समय से डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में भी यह समस्या तेजी से विकसित हो सकती है।जो लोग नियमित जांच नहीं कराते या दवाओं और खानपान में लापरवाही करते हैं, उनमें नसों के डैमेज होने का जोखिम ज्यादा माना जाता है।
इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
डायबिटिक न्यूरोपैथी के लक्षण शुरुआत में हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ गंभीर बन सकते हैं। पैरों और हाथों में झुनझुनी, जलन, सुन्नपन, तेज दर्द, कमजोरी, संतुलन बिगड़ना और स्पर्श का एहसास कम होना इसके सामान्य संकेत हैं।कुछ मरीजों में पाचन संबंधी दिक्कतें, कब्ज, चक्कर आना, हार्टबीट अनियमित होना और अत्यधिक पसीना आने जैसी समस्याएं भी दिखाई दे सकती हैं। यदि ऐसे लक्षण लगातार महसूस हों तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
कैसे करें बचाव?
डायबिटिक न्यूरोपैथी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, समय पर दवाएं और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।विशेषज्ञ नियमित ब्लड शुगर मॉनिटरिंग, पैरों की देखभाल और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराने की सलाह देते हैं। धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना भी नसों को स्वस्थ रखने में मददगार माना जाता है।
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