बांग्लादेश का ‘मक्का पैक्ट’ पर बड़ा संकेत, चीन-पाकिस्तान के करीब आता ढाका; भारत की बढ़ सकती है रणनीतिक चिंता

बांग्लादेश ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की संभावना से इनकार नहीं किया है। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने कहा है कि ढाका अपने राष्ट्रीय हितों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और बदलते व्यापारिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इस समझौते का हिस्सा बनने पर विचार कर सकता है। उनके इस बयान से भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताओं के बीच बांग्लादेश की विदेश नीति को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

क्या है मक्का समझौता और क्यों अहम है?

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने इस महीने की 7 तारीख को मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत तीनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि इनमें से किसी एक देश पर होने वाला सशस्त्र हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से इस समझौते को मुस्लिम देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की दिशा में अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर का यह कहना कि उनका देश अपने हितों को ध्यान में रखते हुए मक्का समझौते में शामिल होने पर विचार कर सकता है, दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक तस्वीर में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। हालांकि, उनके बयान से यह स्पष्ट नहीं है कि ढाका ने औपचारिक रूप से इस गठजोड़ में शामिल होने का फैसला कर लिया है।

पाकिस्तान के साथ भी बढ़ रही नजदीकी

बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों में भी हाल के समय में सक्रियता बढ़ी है। ढाका इस्लामाबाद के साथ व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रहा है। हुमायूं कबीर ने इसे सामान्य राजनयिक जुड़ाव बताया है।

पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क और मक्का रक्षा समझौते में संभावित भागीदारी को एक साथ देखा जाए तो बांग्लादेश की विदेश नीति में नए संतुलन की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि, किसी भी संभावित रक्षा समझौते को लेकर अंतिम फैसला ढाका की ओर से सामने नहीं आया है।

चीन के साथ रिश्ते भी ‘नई ऊंचाई’ पर

बांग्लादेश की रणनीतिक दिशा केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। हुमायूं कबीर के अनुसार चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध ‘नई ऊंचाई’ पर पहुंच गए हैं। चीन पहले से ही बांग्लादेश का एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है।

ऐसे समय में जब ढाका चीन के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है और पाकिस्तान के साथ व्यापारिक तथा जनसंपर्क बढ़ा रहा है, मक्का समझौते को लेकर उसका रुख भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, इन घटनाक्रमों को सीधे तौर पर किसी भारत-विरोधी सैन्य गठजोड़ के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

तारिक रहमान के भारत दौरे पर भी बड़ा बयान

बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण संकेत हुमायूं कबीर के बयान में सामने आया। उन्होंने तारिक रहमान के भारत दौरे को लेकर कहा कि अभी यात्रा करने का ‘सही समय नहीं है।’

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत और बांग्लादेश के संबंधों में कई मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता बनी हुई है। इसलिए तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा को लेकर दिया गया बयान भी दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

क्या बांग्लादेश बन रहा है नए कूटनीतिक समीकरण का हिस्सा?

बांग्लादेश के हालिया रुख से संकेत मिलता है कि ढाका अपनी विदेश नीति में कई शक्तियों के साथ संबंधों को एक साथ साधने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ चीन के साथ उसके संबंध मजबूत हो रहे हैं, दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की कोशिश है। अब मक्का समझौते में संभावित भागीदारी का संकेत इस तस्वीर में एक और आयाम जोड़ता है।

भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह ढाका के साथ अपने पारंपरिक और रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए बदलते क्षेत्रीय समीकरणों पर नजर रखे। मक्का समझौते में बांग्लादेश की संभावित भागीदारी पर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है, इसलिए इसे फिलहाल एक कूटनीतिक संकेत के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

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