रूस और आर्मेनिया के रिश्तों में लगातार खटास बढ़ती जा रही है। कभी मॉस्को का करीबी सहयोगी माना जाने वाला आर्मेनिया अब पश्चिमी देशों की ओर तेजी से झुकाव दिखा रहा है। आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान के हालिया कदमों ने संकेत दे दिए हैं कि देश अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। इस बदलते भू-राजनीतिक समीकरण ने रूस की चिंता बढ़ा दी है, वहीं भारत भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।
रूस और आर्मेनिया के बीच क्यों बढ़ रहा है विवाद?
यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं। इसी बीच आर्मेनिया ने रूस पर अपनी सुरक्षा जरूरतों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है। नागोर्नो-काराबाख संकट के दौरान भी आर्मेनिया को उम्मीद के मुताबिक रूसी समर्थन नहीं मिला, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में दरार और गहरी हो गई।
रूस लगातार यह चाहता है कि आर्मेनिया उसके प्रभाव क्षेत्र में बना रहे और यूरोपीय संघ तथा पश्चिमी देशों के साथ ज्यादा नजदीकियां न बढ़ाए। लेकिन आर्मेनियाई नेतृत्व अब नई रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है।
EU सदस्यता को लेकर बढ़ी हलचल
प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान के नेतृत्व में आर्मेनिया यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने में जुटा हुआ है। देश में यूरोपीय संघ की सदस्यता को लेकर जनमत संग्रह (Referendum) कराने की संभावना भी चर्चा में है। यदि ऐसा होता है तो यह रूस के लिए बड़ा झटका माना जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्मेनिया का यूरोपीय संघ की ओर बढ़ना दक्षिण काकेशस क्षेत्र की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। इससे रूस का क्षेत्रीय प्रभाव कमजोर पड़ सकता है, जबकि पश्चिमी देशों की मौजूदगी मजबूत हो सकती है।
पश्चिमी देशों के साथ बढ़ रही आर्मेनिया की दोस्ती
हाल के महीनों में आर्मेनिया ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी पहल की हैं। सैन्य सहयोग, आर्थिक साझेदारी और लोकतांत्रिक सुधारों के मुद्दों पर भी पश्चिमी देशों के साथ बातचीत तेज हुई है।आर्मेनिया का यह रुख संकेत देता है कि वह अब केवल रूस पर निर्भर रहने के बजाय बहुध्रुवीय विदेश नीति अपनाना चाहता है। यही वजह है कि मॉस्को और येरेवान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत और आर्मेनिया के संबंध हाल के वर्षों में मजबूत हुए हैं। रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है और भारत ने आर्मेनिया को कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियां भी उपलब्ध कराई हैं। ऐसे में यदि दक्षिण काकेशस क्षेत्र में रूस और आर्मेनिया के बीच टकराव और बढ़ता है तो इसका असर क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस बदलती स्थिति पर सतर्क नजर रखनी होगी, क्योंकि आर्मेनिया, रूस और पश्चिमी देशों के बीच उभरते नए समीकरण भविष्य में रक्षा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित कर सकते हैं।
बदलते समीकरणों पर दुनिया की नजर
दक्षिण काकेशस क्षेत्र में जारी यह कूटनीतिक खींचतान केवल रूस और आर्मेनिया तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ, अमेरिका, तुर्की, ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में आर्मेनिया की विदेश नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक तस्वीर बदल सकता है।
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