कारगिल युद्ध पर मौलाना फजलुर रहमान का बड़ा दावा, बोले- ‘शहीदों के शव हिंदुओं को सौंप दिए’, पाकिस्तानी सेना पर अब तक का सबसे तीखा हमला

इस्लामाबाद: पाकिस्तान की धार्मिक-राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फ़ज़ल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने एक बार फिर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ तीखा हमला बोला है। अपने विवादित और आक्रामक बयान के दौरान उन्होंने कारगिल युद्ध का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने अपने ही शहीद सैनिकों का सम्मान नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि कारगिल संघर्ष के दौरान कई पाकिस्तानी सैनिकों के शव स्वीकार नहीं किए गए और उन्हें भारत के पास ही छोड़ दिया गया। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति और सैन्य प्रतिष्ठान को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

कारगिल युद्ध को लेकर सेना पर गंभीर आरोप

एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि पाकिस्तानी सेना को देश के सामने यह बताना चाहिए कि कारगिल युद्ध में कितने सैनिक मारे गए और उनमें से कितनों के शव वापस लाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में शहीद सैनिकों के शव भारत के पास ही रह गए और बाद में भारत की ओर से उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाने की जानकारी दी गई।

उन्होंने कहा कि शहीदों के सम्मान की बात करने वाले सैन्य अधिकारी पहले यह जवाब दें कि उन्होंने अपने ही सैनिकों के साथ कैसा व्यवहार किया। उनके अनुसार, अलग-अलग स्रोतों में मृत सैनिकों की संख्या अलग बताई जाती है, लेकिन यह आंकड़ा सैकड़ों में बताया जाता है।

कर्नल शेर खान के शव को लेकर भी किया दावा

मौलाना फजलुर रहमान ने अपने भाषण में पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी कर्नल शेर खान का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने कर्नल शेर खान के पार्थिव शरीर को भी तत्काल स्वीकार नहीं किया था। उनका दावा है कि भारत के जोर देने के बाद ही पाकिस्तान ने उनका शव स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि यह घटना बताती है कि पाकिस्तानी सेना ने अपने ही शहीदों के सम्मान के साथ न्याय नहीं किया।

‘शहीदों की आड़ में छिपाए जा रहे हैं संस्थागत अपराध’

JUI-F प्रमुख ने कहा कि पाकिस्तानी सेना अपने संस्थागत फैसलों और कथित विफलताओं को छिपाने के लिए शहीद सैनिकों के बलिदान का इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेना अपने राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने के लिए शहीदों के नाम का सहारा लेती है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।

उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति सेना को उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों की याद दिलाता है तो इसे सेना विरोधी गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक संस्था की अपनी तय जिम्मेदारियां होती हैं और उसी दायरे में रहकर काम करना चाहिए।

देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के बाद भी जारी हैं हमले

मौलाना फजलुर रहमान हाल के दिनों में लगातार पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, विशेष रूप से सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर, पर निशाना साध रहे हैं। उनके बयानों के बाद उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया जा चुका है। इसके बावजूद उन्होंने अपने आरोपों का सिलसिला नहीं रोका है और लगातार सैन्य नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सेना अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देने के बजाय राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने में अधिक ऊर्जा लगा रही है। उनके अनुसार, देश की संस्थाओं को अपने निर्धारित अधिकार क्षेत्र में रहकर कार्य करना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत हो सके।

हथियारबंद मिलिशिया बनाने की कोशिशों का भी किया विरोध

अपने संबोधन में मौलाना फजलुर रहमान ने देश के बिगड़ते सुरक्षा हालात का भी जिक्र किया। उन्होंने आम नागरिकों को हथियारबंद मिलिशिया का हिस्सा बनाने की किसी भी कोशिश का विरोध करते हुए कहा कि सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य और उसकी संस्थाओं की होती है। नागरिकों को ऐसे अभियानों में शामिल करना उचित नहीं माना जा सकता।हालांकि, मौलाना फजलुर रहमान के इन दावों पर पाकिस्तानी सेना की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनके बयान ऐसे समय आए हैं जब पाकिस्तान में सेना की भूमिका, राजनीतिक हस्तक्षेप और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पहले से ही तीखी बहस जारी है।

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