वॉशिंगटन/ताइपे: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस सप्ताह होने वाली चीन यात्रा ने ताइवान की रातों की नींद उड़ा दी है। ताइपे के सरकारी गलियारों में इस बात को लेकर गहरी धड़कनें बढ़ी हुई हैं कि क्या ट्रंप अपने ‘लेन-देन’ (Transactional) वाले स्वभाव के चलते ताइवान को बीजिंग के साथ किसी बड़ी डील का हिस्सा बना सकते हैं। व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से ही ताइवान को लेकर ट्रंप के बदलते सुरों ने दुनिया भर के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है।
11 अरब डॉलर के हथियारों की डिलीवरी पर क्यों लगा ग्रहण?
ताइवान की सबसे बड़ी चिंता का विषय वह हथियार पैकेज है जिसे ट्रंप ने पिछले साल दिसंबर में मंजूरी दी थी। करीब 11 अरब डॉलर के इस भारी-भरकम सैन्य सौदे की डिलीवरी अब तक शुरू नहीं हो पाई है। चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि वे इस हथियारों की बिक्री के मुद्दे पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से चर्चा करेंगे। अमेरिका की दशकों पुरानी नीति रही है कि वह ताइवान को दिए जाने वाले समर्थन पर बीजिंग से कभी परामर्श नहीं करता, लेकिन ट्रंप का यह नया रुख इस परंपरा को तोड़ता नजर आ रहा है।
‘सेमीकंडक्टर चोरी’ और सुरक्षा के बदले ‘पैसे’ की मांग
ट्रंप ने हाल के दिनों में ताइवान पर तीखे हमले करते हुए आरोप लगाया है कि ताइवान ने अमेरिका का ‘सेमीकंडक्टर बिजनेस’ चुराया है। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ लहजे में कहा है कि अगर ताइवान को अमेरिकी सुरक्षा चाहिए, तो उसे इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी होगी। ट्रंप के इसी दबाव का नतीजा है कि ताइवान अब अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश करने और अरबों डॉलर का अमेरिकी कच्चा तेल व गैस खरीदने के लिए मजबूर हो रहा है, ताकि ट्रंप के ‘टैरिफ वॉर’ से बचा जा सके।
क्या ताइवान बनेगा ‘सौदेबाजी का मोहरा’?
अमेरिकी नौसेना के सेवानिवृत्त रियर एडमिरल मार्क मोंटगोमरी सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाले शिखर सम्मेलन में ताइवान को एक ‘मुद्दे’ (Bargaining Chip) की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। मोंटगोमरी ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की ‘लेन-देन’ वाली नीति ताइवान के अस्तित्व के लिए चुनौती बन सकती है। उन्हें डर है कि व्यापारिक रियायतों के बदले ट्रंप ताइवान के प्रति अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता को नरम कर सकते हैं।
चीन की चाल और रूबियो का ‘संयम’
चीन ने पहले ही साफ कर दिया है कि ट्रंप के साथ वार्ता में ताइवान का मुद्दा ‘सेंटर स्टेज’ पर रहेगा। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो पर दबाव बनाया है कि अमेरिका ताइवान नीति पर ‘सही निर्णय’ ले। हालांकि, रूबियो ने फिलहाल संयमित रुख अपनाते हुए कहा है कि अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है और वे यथास्थिति में किसी भी जबरदस्ती बदलाव के खिलाफ हैं। रूबियो के इस बयान से ताइवान को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन असली फैसला ट्रंप और शी की बंद कमरे में होने वाली मुलाकात के बाद ही साफ होगा।
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