
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने कहा कि ये अधिकार केवल वैधानिक प्रावधानों के तहत दिए गए हैं और इन्हें कानून के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति Justice B. V. Nagarathna और Justice R. Mahadevan की पीठ ने राजस्थान से जुड़े एक सहकारी संघ विवाद की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार दोनों ही मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि विधि द्वारा निर्धारित अधिकार हैं।
वोट देने और चुनाव लड़ने के अधिकार में फर्क
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है, जबकि चुनाव लड़ना एक अलग और अधिक नियंत्रित अधिकार है। चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को कई प्रकार की योग्यताओं और शर्तों को पूरा करना होता है, जिनमें अयोग्यता के प्रावधान भी शामिल हैं।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद राजस्थान के जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के चुनावी नियमों से जुड़ा हुआ है। ये संघ तीन-स्तरीय ढांचे के तहत संचालित होते हैं और इनके लिए राज्य कानूनों के साथ-साथ बायलॉज बनाए गए हैं। इन बायलॉज में उम्मीदवारों के लिए दूध सप्लाई, कार्यप्रणाली और ऑडिट जैसी शर्तें तय की गई थीं।
हाई कोर्ट का फैसला और विवाद
कुछ प्राथमिक सहकारी समितियों ने इन नियमों को चुनौती देते हुए Rajasthan High Court का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 2015 में हाई कोर्ट की एकल पीठ ने इन बायलॉज को रद्द कर दिया था, हालांकि पहले हुए चुनावों को वैध माना गया। बाद में 2022 में डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट की असहमति
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के तर्कों से असहमति जताई। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की याचिकाओं की स्वीकार्यता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
किन कानूनों से तय होते हैं ये अधिकार
अदालत ने कहा कि वोट देने और चुनाव लड़ने के अधिकार को Representation of the People Act, 1950 और Representation of the People Act, 1951 जैसे कानून नियंत्रित करते हैं। इन कानूनों के तहत यह तय होता है कि कौन वोट दे सकता है, कौन चुनाव लड़ सकता है और किन परिस्थितियों में किसी को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इस टिप्पणी का सीधा मतलब है कि सरकार और विधायिका इन अधिकारों के लिए नियम और शर्तें तय कर सकती हैं। हालांकि, यदि ये नियम संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं या अनुचित पाए जाते हैं, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
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