
काठमांडू। नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच गुरुवार को नए प्रधानमंत्री के चयन के लिए मतदान हो रहा है। जेन-जी आंदोलन के बाद यह देश की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा मानी जा रही है। इसी आंदोलन के दौरान हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई थी। अब पूरे देश की निगाहें इस चुनाव पर टिकी हैं, क्योंकि इससे हिमालयी राष्ट्र की अगली राजनीतिक दिशा तय होगी।
भारत भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। भारत को उम्मीद है कि नेपाल में एक स्थिर सरकार बनेगी, जिससे दोनों देशों के बीच चल रही विकास साझेदारी और कूटनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस बीच देश के कई हिस्सों में राजशाही की बहाली के समर्थन में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं।
नेपाल चुनाव: किन दलों के बीच है मुकाबला
नेपाल के इस चुनाव में मुख्य मुकाबला नए राजनीतिक चेहरे और पारंपरिक दलों के बीच देखने को मिल रहा है। पूर्व रैपर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नवगठित राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) चुनावी मैदान में है।
वहीं पारंपरिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले दो बड़े दल— नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी‑लेनिनवादी) —भी अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
नेपाली कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ने एक बार फिर केपी शर्मा ओली को अपना चेहरा घोषित किया है।
सदियों पुरानी राजशाही से लोकतंत्र तक का सफर
नेपाल लंबे समय तक राजशाही व्यवस्था के अधीन रहा। दिलचस्प बात यह है कि जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब भी नेपाल स्वतंत्र राष्ट्र बना हुआ था।
हालांकि आधुनिक राजनीतिक बदलाव की शुरुआत 1990 में हुई, जब व्यापक जनआंदोलन के बाद राजशाही को पूर्ण सत्ता से हटाकर संवैधानिक राजशाही में बदल दिया गया। इसके बावजूद माओवादी आंदोलन जारी रहा और धीरे-धीरे राजशाही की पकड़ कमजोर पड़ती गई।
आखिरकार पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के शासनकाल में घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि देश में राजशाही का अंत हो गया।
2005 का फैसला बना राजशाही के पतन की वजह
साल 2005 में राजा ज्ञानेंद्र शाह ने संसद भंग कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। इस फैसले ने देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध को जन्म दिया।
लगातार बढ़ते जनदबाव के बाद तीन साल बाद चुनी गई संविधान सभा ने राजशाही को समाप्त करने का ऐतिहासिक फैसला लिया और नेपाल को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। इसके बाद राजधानी काठमांडू स्थित शाही महल को संग्रहालय में बदल दिया गया, जो राजशाही के अंत का प्रतीक माना जाता है।
फिर क्यों उठने लगी राजशाही बहाली की मांग
हालांकि नेपाल में राजशाही औपचारिक रूप से खत्म हो चुकी है, लेकिन इसके समर्थक अब भी मौजूद हैं। पिछले तीन दशकों में लगातार राजनीतिक अस्थिरता ने लोगों में असंतोष बढ़ा दिया है।
1990 के बाद से नेपाल में कई बार सरकारें बनीं, लेकिन अधिकांश सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर गईं। राजनीतिक दलों के अंदरूनी विवाद, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कमजोरियों से जनता में निराशा बढ़ती गई।
युवाओं में बेरोजगारी और अवसरों की कमी ने भी नाराजगी को हवा दी। इसी असंतोष के बीच जेन-जी आंदोलन सामने आया, जिसमें बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए।
‘राजा लाओ-देश बचाओ’ के साथ सड़कों पर समर्थक
देश के कई शहरों में हजारों लोग राजशाही की वापसी की मांग करते हुए रैलियां निकाल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नेपाल को फिर से संवैधानिक राजशाही और हिंदू राष्ट्र का दर्जा दिया जाए।
इस मांग को राजनीतिक समर्थन राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) दे रही है। पार्टी के एजेंडे में संवैधानिक राजशाही की बहाली, नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करना और संघीय व्यवस्था में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संविधान में संशोधन के बिना राजशाही की वापसी संभव नहीं है, जो एक लंबी और जटिल राजनीतिक प्रक्रिया हो सकती है।
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