
मध्य पूर्व की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। रेचेप तैय्यप एर्दोगन की अगुवाई में तुर्की जिस तरह से अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ा रहा है, उसने इजराइल की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भूमध्य सागर में बढ़ते तनाव के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या यह टकराव किसी बड़े संघर्ष का रूप ले सकता है और क्या बेंजामिन नेतन्याहू कोई जल्दबाजी वाला फैसला कर सकते हैं।
भूमध्य सागर में बढ़ता तुर्की का दबदबा
तुर्की ने पिछले कुछ वर्षों में भूमध्य सागर क्षेत्र में अपनी सैन्य और कूटनीतिक पकड़ मजबूत की है। इसका सीधा असर ग्रीस और साइप्रस पर पड़ा है, जो पहले से ही तुर्की की गतिविधियों से असहज हैं। इन दोनों देशों के साथ इजराइल के मजबूत रिश्ते हैं, जिसने समीकरण को और जटिल बना दिया है।
इजराइल-ग्रीस-साइप्रस गठबंधन से बढ़ी टेंशन
इजराइल ने ग्रीस और साइप्रस के साथ मिलकर एक त्रिपक्षीय गठबंधन बनाया है। यह गठबंधन न केवल ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाता है बल्कि तुर्की पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। इजराइल और ग्रीस के बीच नियमित सैन्य अभ्यास तुर्की की नौसेना के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं।
एर्दोगन के ‘5 ब्रह्मास्त्र’ क्या हैं?
तुर्की के पास ऐसे कई रणनीतिक विकल्प हैं, जिन्हें विशेषज्ञ ‘ब्रह्मास्त्र’ मान रहे हैं। इनमें मजबूत नौसेना, ड्रोन तकनीक, क्षेत्रीय गठजोड़, ऊर्जा संसाधनों पर पकड़ और कूटनीतिक दबाव शामिल हैं। एर्दोगन इन सभी का इस्तेमाल कर इजराइल को चारों ओर से घेरने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या नेतन्याहू करेंगे जल्दबाजी?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव और बढ़ा तो इजराइल की ओर से आक्रामक कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, ईरान के साथ हालिया घटनाओं से सबक लेते हुए नेतन्याहू के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी होगी। किसी भी तरह की जल्दबाजी पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है।
क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरण
तुर्की, इजराइल, ग्रीस और साइप्रस के बीच बनते-बिगड़ते रिश्ते यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में भूमध्य सागर वैश्विक राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है। ऊर्जा, सुरक्षा और भू-राजनीतिक हितों की इस लड़ाई में हर देश अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटा है।
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