आवाज़ जिसने बदला भारतीय सिनेमा का इतिहास: 107वीं जयंती पर याद आईं शमशाद बेगम, जिनकी गायकी को मानक मानते थे लता-आशा

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर की जब भी चर्चा होती है, तो एक नाम अपनी अलग पहचान के साथ सामने आता है—शमशाद बेगम। आज उनकी 107वीं जयंती के मौके पर देश उन्हें याद कर रहा है। अपनी बुलंद और खनकदार आवाज़ के दम पर उन्होंने न सिर्फ संगीत की दुनिया में पहचान बनाई, बल्कि प्लेबैक सिंगिंग की दिशा ही बदल दी।

 पहली प्लेबैक सिंगर के रूप में बनाई पहचान

उस दौर में जब फिल्मों में कलाकार खुद गाते थे, तब शमशाद बेगम ने पर्दे के पीछे रहकर आवाज़ देने की परंपरा को लोकप्रिय बनाया। उन्हें भारत की पहली सफल प्लेबैक सिंगर्स में गिना जाता है। उनकी आवाज़ इतनी अलग और प्रभावशाली थी कि वह सीधे दिल में उतर जाती थी।

 लता मंगेशकर और आशा भोसले को दी जाती थी उनकी मिसाल

बताया जाता है कि संगीतकार नई गायिकाओं को अक्सर यही सलाह देते थे कि वे शमशाद बेगम की तरह गाने की कोशिश करें।
लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी दिग्गज गायिकाओं के दौर में भी उनकी अलग पहचान बनी रही।

किशोर कुमार भी करते थे खास सम्मान

उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार तक उनका बेहद सम्मान करते थे। कहा जाता है कि जब भी शमशाद बेगम स्टूडियो में आती थीं, तो किशोर कुमार उनके लिए कुर्सी तक उठाकर रखते थे।

 40-50 के दशक की सबसे दमदार आवाज़

1940 और 1950 के दशक में उनका जादू इस कदर चला कि हर बड़े संगीतकार उनकी आवाज़ को अपनी फिल्मों में शामिल करना चाहता था। उनकी गायकी में एक अनोखी ऊर्जा और साफ़ उच्चारण था, जो उन्हें बाकी गायिकाओं से अलग बनाता था।

 विरासत जो आज भी जिंदा है

आज भले ही शमशाद बेगम हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी पुराने गीतों के जरिए लोगों के दिलों में जिंदा है। भारतीय संगीत जगत में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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