
बच्चों से जुड़ी कई ऐसी बीमारियां होती हैं जिनके बारे में माता-पिता को समय रहते जानकारी नहीं मिल पाती। इन्हीं में से एक है DDH यानी Developmental Dysplasia of the Hip। यह बीमारी नवजात और छोटे बच्चों में पाई जाती है और अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए तो आगे चलकर चलने-फिरने में गंभीर दिक्कतें पैदा कर सकती है।
क्या है DDH बीमारी?
DDH एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे के कूल्हे (हिप जॉइंट) का सही विकास नहीं हो पाता। सामान्य स्थिति में जांघ की हड्डी (फीमर) का सिर कूल्हे की हड्डी के सॉकेट में फिट रहता है, लेकिन DDH में यह जोड़ ढीला या पूरी तरह से बाहर हो सकता है। यही कारण है कि इसे हिप डिस्लोकेशन की समस्या भी कहा जाता है।
कितनी कॉमन है यह बीमारी?
विशेषज्ञों के अनुसार, DDH बहुत दुर्लभ नहीं है। हर 1000 नवजात बच्चों में से लगभग 1 से 2 बच्चों में यह समस्या गंभीर रूप में पाई जा सकती है, जबकि हल्के मामलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा होती है। कई बार यह समस्या जन्म के तुरंत बाद पहचान में नहीं आती, जिससे खतरा बढ़ जाता है।
बच्चों में ही क्यों होती है DDH?
यह बीमारी मुख्य रूप से नवजात और छोटे बच्चों में इसलिए होती है क्योंकि उनके शरीर का विकास अभी पूरी तरह नहीं हुआ होता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- गर्भ में बच्चे की गलत पोजीशन
- परिवार में पहले से इस बीमारी का इतिहास
- बच्ची (लड़कियों में ज्यादा आम)
- जन्म के समय कम जगह (टाइट गर्भाशय)
- ब्रीच डिलीवरी (उल्टी पोजीशन में जन्म)
इन कारणों से हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं हो पाता।
क्या हैं इसके शुरुआती लक्षण?
DDH के लक्षण शुरुआत में बहुत हल्के हो सकते हैं, लेकिन ध्यान देने पर इन्हें पहचाना जा सकता है:
- एक पैर दूसरे से छोटा दिखना
- जांघ या कूल्हे की स्किन में असमान सिलवटें
- पैरों को फैलाने में दिक्कत
- चलने की उम्र में लंगड़ापन
समय पर इलाज क्यों है जरूरी?
अगर DDH का इलाज शुरुआती महीनों में ही शुरू कर दिया जाए तो इसे आसानी से ठीक किया जा सकता है। डॉक्टर आमतौर पर विशेष बेल्ट या हार्नेस का इस्तेमाल करते हैं, जिससे हिप जॉइंट सही पोजीशन में आ जाता है। लेकिन देर होने पर सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है।
माता-पिता क्या रखें ध्यान?
नवजात के नियमित चेकअप बेहद जरूरी हैं। अगर बच्चे के चलने, बैठने या पैरों की मूवमेंट में कोई असामान्यता दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। शुरुआती जांच से इस बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।
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