
कोलन कैंसर को लंबे समय तक बुजुर्गों की बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब इसकी चपेट में कम उम्र की महिलाएं भी तेजी से आ रही हैं। 30 से 40 साल की उम्र की महिलाओं में कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामले विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा रहे हैं। पेट में ऐंठन, ब्लोटिंग और मल त्याग में बदलाव जैसे शुरुआती लक्षणों को कई बार महिलाएं पीरियड्स का दर्द या सामान्य पेट की समस्या समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे बीमारी की पहचान देर से हो पाती है।
युवा महिलाओं में बढ़ रहा है कोलन कैंसर का खतरा
एक समय था जब कोलन कैंसर यानी बड़ी आंत का कैंसर मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ अब कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। खासतौर पर युवा महिलाओं में कोलोरेक्टल कैंसर की बढ़ती संख्या स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आनुवंशिक कारण और परिवार में कैंसर का इतिहास इसके प्रमुख जोखिम कारक हो सकते हैं, लेकिन बदलती जीवनशैली, खराब खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी और बीमारी के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना भी इसके बढ़ते मामलों के पीछे बड़ी वजह बन रहा है।
मेदांता नोएडा के जीआई सर्जरी, जीआई ऑन्कोलॉजी और बैरिएट्रिक सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, युवा महिलाओं में कोलन कैंसर के बढ़ने के पीछे कई ऐसे कारण हैं जिन पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है।
पीरियड्स के दर्द या IBS समझकर महिलाएं कर देती हैं नजरअंदाज
कम उम्र की महिलाओं में कोलन कैंसर की पहचान करना कई बार मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण काफी सामान्य होते हैं। पेट में लगातार दर्द, ऐंठन, गैस, पेट फूलना, कब्ज, दस्त या मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसी समस्याएं अक्सर सामान्य पाचन संबंधी परेशानी या पीरियड्स से जुड़ी तकलीफ मान ली जाती हैं।
कई महिलाएं पेट के निचले हिस्से में होने वाले दर्द को मासिक धर्म के दौरान होने वाली ऐंठन समझ लेती हैं। वहीं कुछ लोग इसे इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) या किसी खाने से होने वाली परेशानी मानकर लंबे समय तक इलाज नहीं कराते। यही देरी बीमारी को गंभीर अवस्था तक पहुंचा सकती है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बढ़ा रहा बीमारी का खतरा
पिछले कुछ वर्षों में लोगों की खान-पान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट मील्स, मीठे पेय पदार्थ और ज्यादा प्रोसेस्ड मीट का सेवन युवाओं में तेजी से बढ़ा है।
इन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों की कमी होती है और इनका ज्यादा सेवन शरीर में सूजन, वजन बढ़ने और आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के संतुलन को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये सभी बदलाव लंबे समय में कोलन कैंसर के जोखिम को बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं।
फाइबर की कमी भी बन सकती है बड़ी वजह
स्वस्थ पाचन तंत्र के लिए डाइटरी फाइबर बेहद जरूरी होता है। फाइबर शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है और आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है।
लेकिन आज की लाइफस्टाइल में कई युवा महिलाएं रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, पैकेज्ड फूड और कम फाइबर वाली डाइट ज्यादा ले रही हैं। सब्जियों, फलों, साबुत अनाज और प्राकृतिक फाइबर वाले खाद्य पदार्थों की कमी पाचन तंत्र पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
लगातार तनाव और खराब लाइफस्टाइल भी बढ़ा रहे खतरे
लंबे समय तक रहने वाला तनाव सीधे तौर पर कोलन कैंसर का कारण नहीं माना जाता, लेकिन यह शरीर के कई ऐसे कारकों को प्रभावित कर सकता है जो बीमारी के खतरे से जुड़े होते हैं।
लगातार तनाव से आंतों के बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ सकता है, शरीर में सूजन बढ़ सकती है, नींद प्रभावित हो सकती है और व्यक्ति की खान-पान व शारीरिक गतिविधियों की आदतें खराब हो सकती हैं।
आज की युवा महिला प्रोफेशनल्स एक साथ नौकरी, घर की जिम्मेदारियां, अनियमित भोजन और कम नींद जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं, जिसका असर उनके पाचन स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
कई लोग मानते हैं कि कम उम्र में कैंसर नहीं हो सकता, जिसके कारण वे शुरुआती संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन शरीर में होने वाले कुछ बदलावों पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है।कोलन कैंसर के संभावित संकेतों में लंबे समय तक कब्ज या दस्त रहना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, मल में खून आना, बिना वजह वजन कम होना, लगातार थकान, पेट दर्द, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया और मल पूरी तरह साफ न होने का एहसास शामिल हो सकते हैं।अगर ऐसे लक्षण लगातार बने रहते हैं तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, क्योंकि शुरुआती चरण में पहचान होने पर इलाज के बेहतर विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
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