Hexagon of Alliance पर सस्पेंस: क्या PM मोदी की इजरायल यात्रा में भारत बनेगा नए ब्लॉक का हिस्सा? जानिए विशेषज्ञों की दो टूक राय

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री Narendra Modi इन दिनों इजरायल दौरे पर हैं। इस बीच पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। वजह है इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu द्वारा प्रस्तावित ‘Hexagon of Alliance’। इस छह देशों के संभावित गठबंधन को लेकर कूटनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है और खासतौर पर पाकिस्तान में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या नौ साल बाद हो रही इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान भारत इस नए रणनीतिक ढांचे का हिस्सा बनेगा या अपनी पारंपरिक विदेश नीति पर कायम रहेगा?
क्या है ‘Hexagon of Alliance’ का फॉर्मूला?
बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने जिस ‘हेक्सागन ऑफ अलायंस’ की रूपरेखा पेश की है, उसमें इजरायल के साथ अमेरिका, भारत, संयुक्त अरब अमीरात, ग्रीस और साइप्रस जैसे देशों को जोड़ने का विचार है। इसे पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर क्षेत्र में सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग का एक व्यापक तंत्र बताया जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार यह प्रारूप पहले से मौजूद I2U2 ढांचे का विस्तार माना जा रहा है, जिसमें भारत, इजरायल, अमेरिका और यूएई शामिल हैं।
डि-हाइफनेशन नीति के खिलाफ जाएगा कदम?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अनिल त्रिगुणायत का मानना है कि भारत ऐसे औपचारिक सैन्य या राजनीतिक गठबंधनों से परंपरागत रूप से दूरी बनाए रखता आया है। उनके मुताबिक ग्रीस और साइप्रस जैसे देशों के साथ भारत के मजबूत संबंध जरूर हैं, लेकिन किसी विशेष धुरी के खिलाफ गठबंधन का हिस्सा बनना भारत की ‘डि-हाइफनेशन’ नीति के विपरीत माना जाएगा। भारत ने पश्चिम एशिया में हमेशा संतुलित कूटनीति अपनाई है—चाहे वह इजरायल हो या फिलिस्तीन, सऊदी अरब हो या ईरान। ऐसे में किसी एक ब्लॉक में औपचारिक रूप से शामिल होना भारत की बहुपक्षीय रणनीति को प्रभावित कर सकता है।
क्या I2U2 का विस्तार है नया प्रस्ताव?
विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. ओमैर अनस का कहना है कि ‘Hexagon of Alliance’ को कुछ लोग मिडिल ईस्टर्न क्वाड कहे जाने वाले I2U2 के विस्तारित रूप में देख रहे हैं। हालांकि, नेतन्याहू ने इसे जिस तरह शिया और सुन्नी चरमपंथी धुरी के खिलाफ संभावित सुरक्षा गठबंधन के रूप में पेश किया है, वह भारत की पारंपरिक विदेश नीति से मेल नहीं खाता। भारत ऐतिहासिक रूप से गुटनिरपेक्ष रुख अपनाता रहा है और औपचारिक सैन्य ब्लॉकों से दूरी बनाए रखता है।
मोदी दौरे का असली एजेंडा क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने पर केंद्रित है। रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा। इजरायल भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच रक्षा व तकनीकी सहयोग लगातार मजबूत हुआ है।
हालांकि ‘Hexagon of Alliance’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि भारत फिलहाल किसी औपचारिक सुरक्षा गठबंधन में शामिल होने की जल्दबाजी नहीं करेगा। भारत की विदेश नीति का मूल आधार रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलन और व्यवहारिकता रहा है। ऐसे में यदि भविष्य में कोई बड़ा निर्णय लिया भी जाता है तो वह व्यापक विचार-विमर्श और राष्ट्रीय हितों के गहन मूल्यांकन के बाद ही संभव होगा।

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