खार्ग आइलैंड पर कब्जे की तैयारी? ट्रंप का ‘मास्टरस्ट्रोक’ रोक देगा ईरान की सांसें, क्या सरेंडर करेंगे खामेनेई?

नई दिल्ली | मध्य पूर्व (Middle East) में बारूद की गंध और मिसाइलों के शोर के बीच एक ऐसी खबर सामने आ रही है जो ईरान की कमर तोड़ सकती है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी युद्ध के 11वें दिन रणनीतिक गलियारों में ‘खार्ग आइलैंड’ (Kharg Island) का नाम गूंज रहा है। दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान की अर्थव्यवस्था की ‘ऑक्सीजन’ कहे जाने वाले इस द्वीप पर कब्जे या इसकी पूर्ण घेराबंदी का मन बना रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो ईरान के पास घुटने टेकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

ईरान की इकोनॉमी की ‘रीढ़’ है यह छोटा सा आइलैंड

फारस की खाड़ी में ईरान के तट से महज 25-30 किलोमीटर दूर स्थित खार्ग आइलैंड क्षेत्रफल में भले ही छोटा हो, लेकिन इसकी अहमियत किसी परमाणु केंद्र से कम नहीं है। यह ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का सबसे बड़ा टर्मिनल है। ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए जिस तेल को दुनिया भर में बेचता है, उसका 90 प्रतिशत हिस्सा इसी द्वीप से होकर गुजरता है। पिछले सात दशकों में यहां अरबों डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है, जो इसे ईरान की वित्तीय मजबूती का सबसे बड़ा केंद्र बनाता है।

ट्रंप की रणनीति: तेल का खेल और ईरान का ‘चेकमेट’

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान और इस्फहान जैसे शहरों पर बमबारी के बावजूद ईरान का अड़ियल रवैया कम नहीं हुआ है। ऐसे में अमेरिका अब सीधे ईरान की जेब पर वार करने की योजना बना रहा है। खार्ग द्वीप पर कब्जे का मतलब है:

  • ईरान के तेल निर्यात पर पूर्ण विराम।

  • खामेनेई सरकार के पास युद्ध लड़ने के लिए फंड की भारी किल्लत।

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई चेन पर सीधा नियंत्रण। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप इस द्वीप को ‘शतरंज के मोहरे’ की तरह इस्तेमाल कर ईरान को बिना लंबी जंग के सरेंडर के लिए मजबूर कर सकते हैं।

ग्लोबल मार्केट में मचेगा हाहाकार, भारत पर भी असर

हालांकि, खार्ग आइलैंड पर कोई भी सैन्य कार्रवाई ‘दोधारी तलवार’ साबित हो सकती है। यह आइलैंड दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते ‘होर्मुज स्ट्रेट’ के बेहद करीब है। यदि यहां धमाके हुए या टैंकरों की आवाजाही रुकी, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। इसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जहाँ पहले ही एलपीजी और ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है।

अब तक अछूता क्यों रहा खार्ग?

हैरानी की बात यह है कि अमेरिका ने अब तक ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर तो भीषण हमले किए, लेकिन खार्ग द्वीप को हाथ नहीं लगाया। यह दिखाता है कि अमेरिका भी इस जगह की वैश्विक अहमियत को समझता है। लेकिन अब, जब युद्ध निर्णायक मोड़ पर है, तो ट्रंप प्रशासन इस ‘इकोनॉमिक न्यूक्लियर बटन’ को दबाने की तैयारी में दिख रहा है।

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