लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों ‘नदी के किनारे’ रहने वाला निषाद समाज सत्ता की चाबी बनता नजर आ रहा है। कहने को तो प्रदेश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी महज 5 प्रतिशत के करीब है, लेकिन सूबे की 160 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करने का माद्दा रखने वाले इस समाज को साधने के लिए भाजपा, सपा और निषाद पार्टी के बीच होड़ मची है। साध्वी निरंजन ज्योति को भाजपा द्वारा मिली बड़ी जिम्मेदारी के बाद अब अखिलेश यादव ने फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को मैदान में उतारकर 2027 का बिगुल फूंक दिया है।
भाजपा का ‘पिछड़ा कार्ड’ बनाम सपा की ‘PDA’ रणनीति
यूपी की राजनीति में निषाद समाज अचानक केंद्र बिंदु बन गया है। भारतीय जनता पार्टी ने कद्दावर नेता साध्वी निरंजन ज्योति को पिछड़ा आयोग का अध्यक्ष बनाकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की, तो समाजवादी पार्टी ने भी तुरंत पलटवार किया। सपा ने ‘दस्यु सुंदरी’ के नाम से मशहूर रहीं पूर्व सांसद फूलन देवी की बहन, 67 वर्षीय रुक्मिणी देवी को अपनी महिला विंग का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। इसे सपा की ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
संजय निषाद पर बरसीं रुक्मिणी देवी: ‘इन्होंने राजनीति की दुकान खोल रखी है’
पद संभालते ही रुक्मिणी देवी ने निषाद पार्टी के मुखिया और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि संजय निषाद ने फूलन देवी के नाम पर समाज को गुमराह किया और राजनीति की ‘दुकान’ चला रहे हैं। रुक्मिणी ने सवाल उठाया कि सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने निषाद समाज के लिए क्या ठोस काम किया? उन्होंने दावा किया कि अब पूरा समाज अखिलेश यादव के नेतृत्व पर भरोसा कर रहा है।
160 सीटों पर सीधा असर: क्यों जरूरी है निषाद वोट बैंक?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यूपी के कुल वोटरों में निषाद समाज की भागीदारी भले ही कम दिखे, लेकिन भौगोलिक रूप से इनका प्रभाव बहुत व्यापक है।
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वोट शेयर: निषाद और उसकी उपजातियों को मिला दें तो यह आबादी 9% तक पहुंच जाती है।
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सीटों का गणित: करीब 80 सीटें ऐसी हैं जहां निषाद वोटर 1 लाख से अधिक हैं, जबकि 160 सीटों पर यह हार-जीत का फैसला करते हैं।
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प्रमुख क्षेत्र: पूर्वांचल (गोरखपुर, बनारस, आजमगढ़, बलिया) से लेकर अवध (प्रयागराज, सुल्तानपुर) और बुंदेलखंड (फतेहपुर) तक इनका प्रभाव फैला है।
बंटा हुआ नेतृत्व: तीन बेल्ट में सिमटी सियासत
राजनीतिक विश्लेषक योगेश मिश्रा का मानना है कि निषाद समाज का कोई एक सर्वमान्य नेता होना मुश्किल है क्योंकि यह समाज तीन अलग-अलग बेल्ट में बंटा है। पहला बनारस से गोरखपुर, दूसरा बनारस से कानपुर और तीसरा बुंदेलखंड का इलाका। मुलायम सिंह यादव ने फूलन देवी के जरिए इस वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश की थी, जिसे अब अखिलेश यादव रुक्मिणी देवी के जरिए दोबारा जीवित करना चाहते हैं। वहीं, भाजपा का संजय निषाद के साथ गठबंधन और निरंजन ज्योति को पद देना इस वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश है।
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