भारत ने एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में रचा नया इतिहास, देसी स्टार्टअप ने किया दुनिया के सबसे एडवांस सुपरसोनिक मिसाइल इंजन का सफल परीक्षण

चेन्नई: भारत ने रक्षा और एयरोस्पेस तकनीक के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है। आईआईटी मद्रास से इनक्यूबेटेड भारतीय एयरोस्पेस स्टार्टअप D-Propulse ने स्वदेशी तकनीक से विकसित 5 kN एयर-ब्रीदिंग रोटेटिंग डिटोनेशन इंजन (Rotating Detonation Engine-RDE) का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है। यह परीक्षण DRDO की परीक्षण सुविधा में किया गया, जिसे देश के उन्नत प्रोपल्शन सिस्टम की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

भारत के लिए क्यों है यह उपलब्धि खास?

रोटेटिंग डिटोनेशन इंजन को भविष्य की हाई-स्पीड मिसाइलों और एडवांस एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण तकनीक माना जाता है। इस तरह की तकनीक पर दुनिया के चुनिंदा विकसित देश ही काम कर रहे हैं। ऐसे में भारत का इस क्षेत्र में सफल परीक्षण करना रक्षा अनुसंधान और स्वदेशी तकनीकी क्षमता के लिहाज से बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

क्या है एयर-ब्रीदिंग रोटेटिंग डिटोनेशन इंजन?

रोटेटिंग डिटोनेशन इंजन (RDE) पारंपरिक रॉकेट या जेट इंजन की तुलना में अधिक दक्षता के साथ काम करने वाली नई पीढ़ी की प्रोपल्शन तकनीक है। यह इंजन वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन का उपयोग करते हुए अधिक ऊर्जा पैदा करने में सक्षम होता है, जिससे भविष्य में तेज गति वाली मिसाइलों, हाई-स्पीड एयरक्राफ्ट और अन्य रक्षा प्रणालियों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

सफल परीक्षण में हासिल हुआ 5 kN थ्रस्ट

स्टार्टअप के अनुसार परीक्षण के दौरान इंजन ने कम एयर मास फ्लो के बावजूद स्थिरता के साथ 5 किलोन्यूटन (kN) का थ्रस्ट उत्पन्न किया। यह क्षमता एक छोटी क्रूज मिसाइल के इंजन के बराबर मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आगे के परीक्षणों और तकनीकी सुधारों के बाद इससे भी अधिक थ्रस्ट प्राप्त किया जा सकता है।

TRL-5 स्तर तक पहुंचा इंजन

D-Propulse के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सौरव झा के मुताबिक, इंजन ने सफलतापूर्वक Technology Readiness Level (TRL)-5 हासिल कर लिया है। इसका अर्थ है कि यह तकनीक अब केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में प्रोटोटाइप के रूप में अपनी क्षमता साबित कर चुकी है और आगे के विकास के लिए तैयार है।

भविष्य की मिसाइलों और UAV में होगा इस्तेमाल

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक का उपयोग भविष्य की सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों, अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV), हाई-स्पीड एयरक्राफ्ट और एडवांस प्रोपल्शन सिस्टम में किया जा सकता है। यदि आगे के परीक्षण भी सफल रहते हैं तो यह तकनीक भारत की अगली पीढ़ी की रक्षा प्रणालियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

स्वदेशी रक्षा तकनीक को मिलेगी नई ताकत

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि से भारत का स्वदेशी प्रोपल्शन इकोसिस्टम और मजबूत होगा। साथ ही विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम करने तथा भविष्य की उन्नत रक्षा परियोजनाओं को गति देने में भी यह तकनीक अहम भूमिका निभा सकती है। एयरोस्पेस क्षेत्र में यह सफलता भारत को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में और मजबूत स्थिति दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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