
भारत और कनाडा के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों से जमी तल्खी अब धीरे-धीरे खत्म होती दिख रही है। बदले हुए वैश्विक समीकरणों के बीच कनाडा ने भारत की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत को नए सिरे से समझना शुरू किया है। इसी कड़ी में Narendra Modi और Mark Carney के बीच हालिया मुलाकातों को रिश्तों की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि ठंडे पड़ चुके संबंधों में गर्माहट लौटाने की ठोस पहल माना जा रहा है।
ट्रूडो युग से अलग नई दिशा
कार्नी का रुख अपने पूर्ववर्ती Justin Trudeau से अलग नजर आता है। ट्रूडो के कार्यकाल में खालिस्तानी अलगाववादी Hardeep Singh Nijjar की हत्या के आरोपों को लेकर दोनों देशों के रिश्ते गंभीर संकट में पहुंच गए थे। आरोप-प्रत्यारोप के दौर ने राजनयिक संवाद को लगभग ठप कर दिया था। लेकिन मार्च में पदभार संभालने के बाद कार्नी ने संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाते हुए नई दिल्ली के साथ रिश्ते सुधारने के संकेत दिए।
CEPA पर जमी धूल हटाने की कोशिश
पिछले वर्ष जून और नवंबर में मोदी और कार्नी की मुलाकातों ने संवाद की राह खोली। लंबे समय से लंबित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर वार्ता दोबारा शुरू करने पर सहमति बनी। डेढ़ दशक से अटका यह समझौता यदि आगे बढ़ता है तो दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को नई गति मिल सकती है। भारत और कनाडा ने 2030 तक 70 अरब डॉलर वार्षिक व्यापार का लक्ष्य तय किया है, जिसे हासिल करने में CEPA अहम भूमिका निभा सकता है।
ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और शिक्षा में नए अवसर
दोनों देश अब केवल पुराने विवादों को पीछे छोड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि भविष्य के सहयोग की ठोस रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। व्यापार, स्वच्छ ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, शिक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों में बातचीत फिर तेज हो रही है। कनाडा से भारत को यूरेनियम आपूर्ति बढ़ाने पर चर्चा हो रही है। साथ ही कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाने के विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। पाइपलाइन और टर्मिनल जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में संयुक्त निवेश की संभावनाएं भी खंगाली जा रही हैं।
मजबूत आर्थिक आधार, अब विस्तार की बारी
वर्ष 2024 में भारत और कनाडा के बीच वस्तु व्यापार 13.3 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जिसमें 5.3 अरब डॉलर का निर्यात कनाडा की ओर से रहा। सेवाओं के क्षेत्र में भी तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक रिश्तों की नींव मजबूत बनी रही। अब जब शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर संवाद बहाल हुआ है, तो इस आधार को और व्यापक बनाने की दिशा में कदम तेज हो सकते हैं।
अमेरिका की टैरिफ नीति और साझा रणनीति
वैश्विक व्यापार पर अमेरिका की टैरिफ नीतियों ने कई देशों को प्रभावित किया है। हालिया घटनाक्रम के बाद भले कुछ राहत मिली हो, लेकिन अनिश्चितता बरकरार है। ऐसे माहौल में भारत और कनाडा जैसे लोकतांत्रिक देशों के लिए आपसी सहयोग और भी जरूरी हो जाता है। कार्नी ने वैश्विक मंचों पर अमेरिकी नीतियों पर खुलकर राय रखी है, वहीं भारत ने भी स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर दिया है। ऐसे में दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी वैश्विक मंच पर संतुलन बनाने में सहायक हो सकती है।
कुल मिलाकर, मोदी और कार्नी की कूटनीतिक सक्रियता ने यह संकेत दे दिया है कि भारत-कनाडा संबंध अब टकराव की जगह सहयोग की नई राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि CEPA पर ठोस प्रगति होती है और ऊर्जा व निवेश के क्षेत्र में समझौते आगे बढ़ते हैं, तो आने वाले वर्षों में यह साझेदारी वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।
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