
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध संकट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से वैश्विक तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसका असर अब भारत समेत कई देशों में साफ दिखाई देने लगा है, जहां पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की भारी कमी की आशंका गहराने लगी है। इसी बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देशवासियों से ईंधन बचाने की अपील करते हुए ‘वर्क फ्रॉम होम’ और वर्चुअल मीटिंग्स को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है।प्रधानमंत्री ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह पेट्रोल और डीजल का सोच-समझकर इस्तेमाल करे। सरकार का मानना है कि यदि लोग अनावश्यक यात्रा से बचें और डिजिटल माध्यमों का ज्यादा उपयोग करें, तो ईंधन की खपत में काफी कमी लाई जा सकती है।
ईंधन संकट ने बढ़ाई भारत की चिंता
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करते हैं। देश करीब 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन में आने वाली किसी भी रुकावट का सीधा असर भारतीय बाजार और आम जनता पर पड़ता है। मौजूदा संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारत कब तक विदेशी तेल पर इतनी भारी निर्भरता बनाए रखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री की अपील फिलहाल राहत देने वाला कदम हो सकती है, लेकिन लंबे समय में भारत को मजबूत ऊर्जा ढांचे और वैकल्पिक सप्लाई सिस्टम की जरूरत पड़ेगी। इसी वजह से अब कई पुराने पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स फिर चर्चा में आ गए हैं।
तीन बड़े प्रोजेक्ट जो बदल सकते हैं भारत की ऊर्जा तस्वीर
भारत पिछले कई दशकों से ऐसे बड़े पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स पर विचार करता रहा है, जो देश को ऊर्जा संकट से स्थायी राहत दे सकें। इनमें ओमान-इंडिया डीपवॉटर पाइपलाइन, इंडिया-श्रीलंका ऑयल पाइपलाइन और TAPI गैस पाइपलाइन जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शामिल हैं। हालांकि राजनीतिक तनाव, भारी लागत और रणनीतिक चुनौतियों के कारण ये योजनाएं अब तक पूरी नहीं हो सकीं।
लेकिन मौजूदा हालात ने इन परियोजनाओं की अहमियत फिर बढ़ा दी है। नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन योजनाओं को तेजी से लागू किया जाए, तो भविष्य में भारत को बार-बार आने वाले ईंधन संकटों से काफी हद तक राहत मिल सकती है।
ओमान-इंडिया डीपवॉटर पाइपलाइन पर फिर बढ़ी उम्मीद
सबसे चर्चित परियोजनाओं में ओमान-इंडिया डीपवॉटर पाइपलाइन एक बार फिर सुर्खियों में है। इस महत्वाकांक्षी योजना पर पहली बार 1990 के दशक में चर्चा शुरू हुई थी। प्रस्तावित पाइपलाइन करीब 1600 किलोमीटर लंबी होगी, जो ओमान के रास-अल-जिफान से गुजरात के पोरबंदर तक समुद्र के भीतर बिछाई जाएगी।
बताया जाता है कि पाइपलाइन कुछ हिस्सों में समुद्र की 3500 मीटर गहराई तक जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक गैस की सप्लाई सुनिश्चित करना है। इस रूट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील जमीनी इलाकों से बचते हुए सीधे भारत तक ऊर्जा पहुंचा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस परियोजना के जरिए भारत को आयातित LNG की तुलना में कम लागत पर गैस मिल सकती है। अनुमान है कि इस प्रोजेक्ट पर 5 से 6 अरब डॉलर तक खर्च आ सकता है और यह आने वाले दो दशकों तक भारत की ऊर्जा जरूरतों को मजबूती दे सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा अब भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
दुनिया में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आयात पर निर्भरता कम करे और घरेलू ऊर्जा ढांचे को मजबूत बनाए।फिलहाल सरकार लोगों से ईंधन बचाने की अपील कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और सुरक्षित सप्लाई नेटवर्क पर तेजी से काम करना होगा, तभी देश बार-बार आने वाले वैश्विक तेल संकटों से खुद को सुरक्षित रख पाएगा।
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