
नई दिल्ली। दिल्ली की जिला अदालतों की शक्तियों में बड़ा बदलाव किए जाने का प्रस्ताव सामने आया है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो राजधानी की जिला अदालतें अब ₹10 करोड़ तक के दीवानी (सिविल) मामलों की सुनवाई कर सकेंगी। अभी तक यह सीमा ₹2 करोड़ है। हालांकि इस प्रस्ताव ने न्यायिक जगत में नई बहस छेड़ दी है। दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) ने इसका विरोध करते हुए 14 जुलाई को न्यायिक कार्य से दूर रहने का फैसला किया है।
क्या है जिला अदालतों की आर्थिक अधिकारिता बढ़ाने का प्रस्ताव?
प्रस्ताव के मुताबिक दिल्ली की जिला अदालतों की आर्थिक अधिकारिता (Pecuniary Jurisdiction) को मौजूदा ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने की तैयारी है। इसका सीधा मतलब यह होगा कि ₹2 करोड़ से लेकर ₹10 करोड़ तक मूल्य वाले दीवानी विवादों की सुनवाई अब हाईकोर्ट के बजाय जिला अदालतों में हो सकेगी।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो बड़ी संख्या में ऐसे सिविल मुकदमे, जो अब तक सीधे दिल्ली हाईकोर्ट में दायर किए जाते थे, वे जिला अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आ जाएंगे। हालांकि इस प्रस्ताव पर अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने क्यों जताया विरोध?
इस प्रस्ताव का दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने कड़ा विरोध किया है। एसोसिएशन का कहना है कि आर्थिक अधिकारिता में इतनी बड़ी वृद्धि से न्यायिक व्यवस्था और वादकारियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसी विरोध के तहत एसोसिएशन ने 14 जुलाई को न्यायिक कार्य से अलग रहने का निर्णय लिया।
इस मुद्दे पर अधिवक्ताओं और न्यायिक समुदाय के बीच अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ लोग इसे न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में अहम कदम मान रहे हैं, जबकि कई अधिवक्ता इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जता रहे हैं।
क्या होता है Pecuniary Jurisdiction?
Pecuniary Jurisdiction का हिंदी अर्थ आर्थिक अधिकारिता या आर्थिक क्षेत्राधिकार होता है। यह वह कानूनी सीमा होती है, जिसके आधार पर तय किया जाता है कि किसी अदालत को कितनी राशि या संपत्ति मूल्य तक के दीवानी मामलों की सुनवाई करने का अधिकार है।
सरल भाषा में समझें तो यदि किसी संपत्ति, अनुबंध, धनराशि या अन्य सिविल विवाद का मूल्य अदालत की निर्धारित आर्थिक सीमा के भीतर है, तो उसी अदालत में उस मामले की सुनवाई की जाती है।
यदि प्रस्ताव लागू हुआ तो क्या बदलेगा?
अगर आर्थिक अधिकारिता को ₹10 करोड़ तक बढ़ाने का फैसला लागू होता है तो दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल होने वाले कई सिविल मुकदमे सीधे जिला अदालतों में सुने जाएंगे। इससे हाईकोर्ट पर मामलों का दबाव कम होने की संभावना जताई जा रही है। वहीं दूसरी ओर इस बदलाव को लेकर अधिवक्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा लगातार जारी है।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसके बाद ही स्पष्ट होगा कि दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था में यह बड़ा बदलाव कब और किस स्वरूप में लागू किया जाएगा।
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