
रूस में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पहली संसदीय चुनावी प्रक्रिया में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समर्थन वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी ने मजबूत बढ़त बना ली है। शुरुआती नतीजों में पार्टी को पार्टी-लिस्ट वाली 225 सीटों के लिए हुए मतदान में करीब 58 फीसदी वोट मिले हैं। साथ ही, एकल निर्वाचन क्षेत्रों की ज्यादातर सीटों पर भी यूनाइटेड रशिया के उम्मीदवारों के आगे रहने की तस्वीर सामने आई है। चुनाव तीन दिनों तक चला और रविवार को मतदान समाप्त हुआ।
यूक्रेन युद्ध के बाद पहला संसदीय चुनाव
18 से 20 सितंबर 2026 तक हुए इस चुनाव को रूस के लिए खास माना जा रहा है, क्योंकि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू होने के बाद यह पहला संसदीय चुनाव है। रूस की 450 सदस्यीय स्टेट ड्यूमा के सभी सदस्यों के लिए मतदान हुआ। इनमें 225 सीटें पार्टी-लिस्ट प्रणाली और बाकी 225 सीटें एकल निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी जाती हैं।
क्रेमलिन ने चुनाव को युद्ध के बीच देश में राजनीतिक स्थिरता और समर्थन दिखाने के मौके के तौर पर पेश किया। पुतिन ने मतदान से पहले कहा था कि चुनाव का नतीजा यह दिखाएगा कि रूस के लोग देश और यूक्रेन में लड़ रहे रूसी सैनिकों के साथ खड़े हैं। वहीं, आलोचकों और विपक्षी समूहों ने चुनावी माहौल को लेकर सवाल उठाए हैं।
यूनाइटेड रशिया को कितनी बढ़त मिली?
रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, करीब 58 फीसदी मतपत्रों की गिनती तक यूनाइटेड रशिया को पार्टी-लिस्ट वोट में लगभग 58 फीसदी समर्थन मिला था। मतदान प्रतिशत रविवार शाम तक करीब 57 फीसदी बताया गया। एकल सीटों वाले निर्वाचन क्षेत्रों में भी पार्टी के उम्मीदवार बड़ी संख्या में आगे रहे।
यूनाइटेड रशिया की यह बढ़त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा ड्यूमा में भी पार्टी के पास दो-तिहाई के आसपास का बहुमत रहा है। चुनाव से पहले ही उसे अपना संसदीय दबदबा बरकरार रखने की व्यापक उम्मीद जताई जा रही थी।
पुतिन के लिए बहुमत इतना महत्वपूर्ण क्यों?
रूस की संसद का निचला सदन यानी स्टेट ड्यूमा सामान्य कानून बनाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। सामान्य संघीय कानूनों के लिए ड्यूमा में कुल सदस्यों के बहुमत की जरूरत होती है, जबकि कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक कानूनों के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी है।
संविधान के अध्याय 3 से 8 में संशोधन के लिए भी संघीय संवैधानिक कानून जैसी प्रक्रिया लागू होती है। इसमें स्टेट ड्यूमा के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी के साथ फेडरेशन काउंसिल में तीन-चौथाई समर्थन और संबंधित क्षेत्रीय विधानसभाओं की मंजूरी की जरूरत होती है। इसलिए ड्यूमा में दो-तिहाई बहुमत किसी भी सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण संसदीय ताकत देता है।
युद्ध के बीच चुनाव का राजनीतिक संदेश
रूसी नेतृत्व के लिए यह चुनाव केवल संसद की सीटों तक सीमित नहीं है। रॉयटर्स के विश्लेषण के मुताबिक, क्रेमलिन चुनाव परिणामों को यूक्रेन युद्ध के प्रति घरेलू समर्थन के तौर पर पेश कर सकता है। पुतिन के लिए यह दिखाने का भी अवसर है कि युद्ध के बीच रूस की राजनीतिक व्यवस्था सामान्य रूप से काम कर रही है।
रूस में युद्ध के असर अब घरेलू स्तर पर भी महसूस किए जा रहे हैं। यूक्रेन की ओर से रूसी क्षेत्र में ड्रोन हमलों में बढ़ोतरी, तेल प्रतिष्ठानों पर हमले और ईंधन से जुड़ी परेशानियों ने चुनाव के दौरान सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के मुद्दों को भी महत्वपूर्ण बनाया। मतदान के अंतिम दिन रूस के रक्षा मंत्रालय ने बड़ी संख्या में यूक्रेनी ड्रोन गिराने का दावा किया था।
विपक्ष को लेकर भी उठ केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रमुख एला पामफिलोवा ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली पर साइबर हमले का दावा किया। वहीं, कुछ स्वतंत्र रूसी मीडिया रिपोर्टों में मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन और कागजी मतपत्र जारी करने से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों की बात कही गई। में भी मतदान कराया गया जिन्हें मॉस्को ने अपने में शामिल करने का दावा किया है। यूक्रेन ने इन क्षेत्रों में रूसी चुनाव कराने को अवैध बताया है। यूरोपीय संघ ने भी इन क्षेत्रों में मतदान की आलोचना की औरुतिन के लिए आगे क्या मायने रखता है बहुमत बरकरार रखती है, तो क्रेमलिन को संसद के भीतर मजबूत समर्थन मिलता रहेगा। इसका असर सरकार के विधायी एजेंडे, संवैधानिक कानूनों और युद्ध से जुड़े घरेलू फैसलों पर पड़ सकता है। हालांकि किसी भी संवैधानिक बदलाव के लिए केवल ड्यूमा का बहुमत पर्याप्त नहीं होता और रूसी संविधान में अलग-अलग प्रकार के बदलावों के लिए अतिरिक्त संसदीय तथा क्षेत्रीय मंजूरियों का प्रावधान है। के रूप में पेश कर सकता है। वहीं, विपक्ष और आलोचक चुनावी प्रतिस्पर्धा, उम्मीदवारों की भागीदारी और मतदान प्रक्रिया को लेकर अलग दावे कर रहे हैं। ऐसे में अंतिम आधिकारिक नतीजों के साथ-साथ चुनाव की प्रक्रिया और विभिन्न पक्षों के दावों पर भी नजर रहेगी। े सवाल
चुनाव के दौरान विपक्ष की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सवाल उठे। याब्लोको पार्टी, जो यूक्रेन युद्ध की खुले तौर पर आलोचना करने वाली प्रमुख पंजीकृत राजनीतिक ताकतों में शामिल थी, को पार्टी-लिस्ट चुनाव से बाहर कर दिया गया। हालांकि उसके कुछ उम्मीदवार एकल निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ सके। कुछ अन्य विपक्षी नेताओं को जेल या निर्वासन का सामना करना पड़ा।
कुछ राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने मतदान केंद्रों पर कथित अनियमितताओं की शिकायतें भी कीं। इन आरोपों में मतपेटियों, कागजी मतपत्रों और पर्यवेक्षकों को लेकर शिकायतें शामिल थीं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है।
मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को लेकर विवाद
मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली को लेकर भी विवाद सामने आया। रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रमुख एला पामफिलोवा ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली पर साइबर हमले का दावा किया। वहीं, कुछ स्वतंत्र रूसी मीडिया रिपोर्टों में मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन और कागजी मतपत्र जारी करने से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों की बात कही गई।
यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों में भी मतदान
इस चुनाव में रूस की ओर से यूक्रेन के उन क्षेत्रों में भी मतदान कराया गया जिन्हें मॉस्को ने अपने में शामिल करने का दावा किया है। यूक्रेन ने इन क्षेत्रों में रूसी चुनाव कराने को अवैध बताया है। यूरोपीय संघ ने भी इन क्षेत्रों में मतदान की आलोचना की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया।
पुतिन के लिए आगे क्या मायने रखता है?
अगर यूनाइटेड रशिया अंतिम नतीजों में भी ड्यूमा में अपना बड़ा बहुमत बरकरार रखती है, तो क्रेमलिन को संसद के भीतर मजबूत समर्थन मिलता रहेगा। इसका असर सरकार के विधायी एजेंडे, संवैधानिक कानूनों और युद्ध से जुड़े घरेलू फैसलों पर पड़ सकता है। हालांकि किसी भी संवैधानिक बदलाव के लिए केवल ड्यूमा का बहुमत पर्याप्त नहीं होता और रूसी संविधान में अलग-अलग प्रकार के बदलावों के लिए अतिरिक्त संसदीय तथा क्षेत्रीय मंजूरियों का प्रावधान है।
इस चुनाव का दूसरा बड़ा पहलू यह है कि क्रेमलिन इसके नतीजों को यूक्रेन युद्ध के लिए घरेलू समर्थन के संकेत के रूप में पेश कर सकता है। वहीं, विपक्ष और आलोचक चुनावी प्रतिस्पर्धा, उम्मीदवारों की भागीदारी और मतदान प्रक्रिया को लेकर अलग दावे कर रहे हैं। ऐसे में अंतिम आधिकारिक नतीजों के साथ-साथ चुनाव की प्रक्रिया और विभिन्न पक्षों के दावों पर भी नजर रहेगी।
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