बांग्लादेश चुनाव: तारिक रहमान की प्रचंड जीत ने उड़ाए पाकिस्तान के होश, पर भारत के लिए क्यों बज रही खतरे की घंटी?

ढाका/नई दिल्ली। बांग्लादेश के संसदीय चुनावों में खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर लिया है। तारिक रहमान के नेतृत्व में मिली इस बड़ी जीत ने न केवल देश की आंतरिक राजनीति को बदल दिया है, बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया है। हालांकि, इस ‘लैंडस्लाइड विक्ट्री’ के बीच रक्षा और कूटनीतिक गलियारों में भारत को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ढाका में सत्ता परिवर्तन दिल्ली के लिए कई नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

जमात और पाकिस्तान का ‘गेम’ हुआ फेल

चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि बांग्लादेश की जनता ने इस बार किसी बाहरी प्रभाव के बजाय स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जताया है। लंबे समय से यह माना जा रहा था कि पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी, BNP की आड़ में अपनी जड़ें मजबूत करेंगे। लेकिन तारिक रहमान ने जिस तरह से अपनी पकड़ बनाई, उसने इन ताकतों को हाशिए पर धकेल दिया है। जानकारों का कहना है कि जमात को उम्मीद थी कि गठबंधन सरकार बनने की स्थिति में वह ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाएगी, लेकिन BNP को मिले पूर्ण बहुमत ने उनकी सौदेबाजी की ताकत को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

भारत के लिए ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति

भले ही पाकिस्तान का खेल बिगड़ गया हो, लेकिन भारत के लिए यह जीत पूरी तरह चिंतामुक्त होने वाली खबर नहीं है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अवामी लीग के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में जो स्थिरता और सुरक्षा सहयोग था, वह BNP के कार्यकाल में बरकरार रहेगा या नहीं, इस पर संशय है। सबसे बड़ी चिंता पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और उग्रवादी गुटों को मिलने वाली संभावित पनाह को लेकर है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि ढाका की नई सरकार ने सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर ढील दी, तो इसका सीधा असर भारत के ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर और आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

क्या बदल जाएगी ढाका की विदेश नीति?

तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार पर अब पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। क्या वे अपनी पुरानी भारत-विरोधी छवि से बाहर निकलकर एक नए व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में उभरेंगे, या फिर चीन के बढ़ते निवेश के जाल में फंसकर भारत से दूरी बनाएंगे? कूटनीतिज्ञों का मानना है कि भारत को अब नई सरकार के साथ नए सिरे से ‘एंगेज’ होने की जरूरत है ताकि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बना रहे। फिलहाल, दिल्ली के गलियारों में ‘सावधान’ रहने और हर कदम फूंक-फूंक कर रखने की सलाह दी जा रही है।

Check Also

ऊर्जा संकट में भारत बना बांग्लादेश का सबसे बड़ा सहारा, 5000 टन अतिरिक्त डीजल सप्लाई से मिली राहत

पहले भी लगातार मदद करता रहा है भारत, कुल सप्लाई का आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे …