बोस्टन। मेडिकल साइंस की दुनिया में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई है। वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसी तकनीक का इंसानों पर परीक्षण शुरू किया है, जिसका उद्देश्य बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करना और कोशिकाओं को दोबारा युवा बनाना है। अमेरिका में एक मरीज को ‘रिवर्स एजिंग’ से जुड़ा पहला इंजेक्शन दिया गया है, जिसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने की दिशा में बड़ी सफलता माना जा रहा है।
ग्लूकोमा मरीज पर किया गया पहला मानव परीक्षण
अमेरिका के बोस्टन स्थित बायोटेक कंपनी लाइफ बायोसाइंसेज ने जानकारी दी है कि उसके क्लीनिकल ट्रायल के तहत पहले मरीज को सेल्यूलर रीप्रोग्रामिंग आधारित इंजेक्शन दिया गया। यह इंजेक्शन ग्लूकोमा यानी काला मोतिया से पीड़ित मरीज की एक आंख की पुतली में लगाया गया है। कंपनी का दावा है कि यह तकनीक उम्र बढ़ने के कारण क्षतिग्रस्त या कमजोर हो चुकी कोशिकाओं को फिर से सक्रिय और स्वस्थ बनाने की क्षमता रखती है।
क्या है सेल्यूलर रीप्रोग्रामिंग तकनीक?
सेल्यूलर रीप्रोग्रामिंग एक अत्याधुनिक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की पुरानी और उम्रदराज कोशिकाओं को जैविक रूप से अधिक युवा अवस्था में वापस लाने की कोशिश की जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक सफल रहती है तो भविष्य में उम्र से जुड़ी कई बीमारियों के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
अगले छह महीने तक होगी गहन निगरानी
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह ट्रायल अभी शुरुआती चरण में है। इंजेक्शन देने के बाद अगले छह महीनों तक मरीज की लगातार निगरानी की जाएगी। इस दौरान वैज्ञानिक यह जांचेंगे कि उपचार का असर कितना प्रभावी है और इससे किसी प्रकार के दुष्प्रभाव तो सामने नहीं आते। ट्रायल के नतीजे भविष्य में एंटी-एजिंग चिकित्सा के नए रास्ते खोल सकते हैं।
बुढ़ापा रोकने की दवा की तलाश को मिल सकती है नई दिशा
दुनियाभर के वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो उम्र बढ़ने की रफ्तार को कम कर सकें या शरीर की कोशिकाओं को दोबारा युवा बना सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मानव परीक्षण सफल साबित होता है तो उम्र से जुड़ी बीमारियों, दृष्टि संबंधी समस्याओं और कई गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों के इलाज में नई उम्मीद पैदा हो सकती है।
चिकित्सा जगत की नजरें इस ट्रायल पर
यह ट्रायल केवल ग्लूकोमा के इलाज तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की एंटी-एजिंग मेडिसिन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। अब वैज्ञानिक समुदाय की नजरें आने वाले महीनों में सामने आने वाले परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि क्या वास्तव में इंसानी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है।
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