शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर देशभर के शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के इस पर्व पर उत्तराखंड की शांत वादियों में स्थित एक ऐसा चमत्कारी और प्राचीन शक्तिपीठ चर्चा में है, जिसके इतिहास से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद अनोखी है। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित ‘मां आदि बद्री भगवती मंदिर (Maa Adi Badri Bhagwati Temple)’ की, जहाँ मां दुर्गा ने असुरों का संहार करने के लिए एक अद्भुत रूप धारण किया था।
निशुम्भ दैत्य के वध और हिरण के रूप की पौराणिक कथा
हिंदू पौराणिक ग्रंथों और जनश्रुतियों के अनुसार, प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो मायावी और अत्याचारी दैत्यों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। देवताओं को पराजित कर उन्होंने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था।
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हिरण का रूप धारण: कथा के अनुसार, जब दैत्यराज निशुम्भ का अत्याचार चरम पर था और उसका वध करना आवश्यक हो गया था, तब माता भगवती ने एक चाल चली और देवताओं की रक्षा के लिए ‘हिरण’ (मृग) का रूप धारण किया।
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वध का रहस्य: भगवती के इस रूप को देखकर निशुम्भ भ्रमित हो गया और उनका पीछा करते हुए इस स्थान तक आ पहुँचा। यहाँ पहुँचकर माता ने अपने असली और दिव्य स्वरूप में आकर महाबली निशुम्भ का वध किया और संसार को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इसी पौराणिक घटना के बाद से इस पावन स्थल को अत्यंत पवित्र शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाने लगा।
उत्तराखंड के बागेश्वर में स्थित है यह जागृत शक्तिपीठ
यह ऐतिहासिक और धार्मिक मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित है। हिमालय की गोद में और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे होने के कारण यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहाँ की दिव्यता सैलानियों को भी अपनी ओर खींचती है।
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नवरात्र का विशेष महत्व: शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान यहाँ विशेष अनुष्ठान, महापूजा और भव्य मेलों का आयोजन होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर इस शक्तिपीठ में पहुँचते हैं।
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आदि बद्री धाम का हिस्सा: यह क्षेत्र अपनी प्राचीन वास्तुकला और धार्मिक महत्ता के लिए भी जाना जाता है, जो पांडव काल और प्राचीन राजवंशों के इतिहास से जुड़ा हुआ है।
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