Janmashtami Night Fasting Rules: जन्माष्टमी पर रात में सोने और फलाहार को लेकर क्या हैं शास्त्रीय नियम?
Janmashtami Rules: हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। यही वजह है कि जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की विशेष पूजा का विधान निशीथ काल यानी मध्यरात्रि के समय बताया गया है। भक्त इस दौरान व्रत रखते हैं और रात में भगवान के जन्म के समय पूजा-अर्चना कर व्रत का पारण करते हैं।
जन्माष्टमी को कई धार्मिक परंपराओं में मोहरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रत, पूजा और भगवान कृष्ण के जन्म के समय होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ रात में सोने और व्रत के दौरान फलाहार करने को लेकर भी कई नियम बताए गए हैं। ऐसे में अगर आप भी जन्माष्टमी का व्रत रखने जा रहे हैं तो इन परंपराओं और नियमों के बारे में जानना जरूरी है।
जन्माष्टमी की रात सोने को लेकर क्या है नियम?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए व्रत रखने वाले भक्त रात में जागकर भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार करते हैं। निशीथ काल में भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है और जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसी कारण जन्माष्टमी की रात को आधी रात से पहले सोने से बचने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है।
भक्त रात 12 बजे के आसपास भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं। इस दौरान भगवान का अभिषेक, पूजन, आरती और भोग लगाया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु अपनी धार्मिक परंपरा और व्रत के नियमों के अनुसार आगे की पूजा-विधि पूरी करते हैं।
जन्माष्टमी व्रत में फलाहार के क्या हैं नियम?
जन्माष्टमी के व्रत में खान-पान को लेकर भी विशेष सावधानी बरती जाती है। व्रत रखने वाले कई श्रद्धालु पूरे दिन अन्न का सेवन नहीं करते और अपनी क्षमता तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक आहार लेते हैं। फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना और व्रत में मान्य अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है।
हालांकि फलाहार का नियम हर व्यक्ति और हर धार्मिक परंपरा में एक जैसा नहीं होता। कुछ भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं। इसलिए व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति और परिवार में चली आ रही धार्मिक परंपरा के अनुसार ही व्रत का पालन करना चाहिए।
निशीथ काल में क्यों होती है भगवान कृष्ण की पूजा?
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का संबंध मध्यरात्रि से माना जाता है। इसी वजह से जन्माष्टमी की पूजा में निशीथ काल को विशेष महत्व दिया जाता है। श्रद्धालु इस समय भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं और उन्हें स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाते हैं। इसके बाद पूजा, आरती और भोग की परंपरा निभाई जाती है।
जन्माष्टमी की रात भगवान कृष्ण की बाल स्वरूप में पूजा करने की भी परंपरा है। मंदिरों और घरों में झूला सजाया जाता है तथा लड्डू गोपाल को झूला झुलाया जाता है। कई जगहों पर कृष्ण जन्म के समय शंख और घंटियां बजाकर उत्सव मनाया जाता है।
व्रत खोलने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
जन्माष्टमी व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को व्रत खोलने यानी पारण का समय भी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार देखना चाहिए। केवल मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के बाद तुरंत सामान्य भोजन करना हर परंपरा में जरूरी नहीं माना जाता। व्रत और पारण की विधि के लिए स्थानीय पंचांग तथा परिवार की परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
डिस्क्लेमर: जन्माष्टमी व्रत और पूजा से जुड़े नियम अलग-अलग धार्मिक परंपराओं, क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकते हैं। किसी विशेष व्रत-विधि का पालन करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग या योग्य धर्माचार्य से जानकारी लेना उचित है।
Hindustan Awaaz – Hindustan Newspaper, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया
