दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने बदला अपना नाम, अब ‘नौरू’ नहीं बल्कि ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’; 21वीं सदी में ऐसा करने वाला बना आठवां देश

यारेन। प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने अपनी राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब तक ‘नौरू’ (Nauru) के नाम से पहचाना जाने वाला यह द्वीपीय राष्ट्र आधिकारिक तौर पर ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ (Republic of Naoero) कहलाएगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में देश के नए नाम को शामिल कर लिया है।

करीब 12 हजार की आबादी वाले इस छोटे से देश की सरकार का कहना है कि ‘नाओएरो’ उसका मूल और पारंपरिक नाम है, जबकि ‘नौरू’ नाम विदेशी लोगों की सुविधा के लिए प्रचलित हुआ था। सरकार का मानना है कि अब समय आ गया है कि देश अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ दुनिया के सामने जाना जाए।

21वीं सदी में नाम बदलने वाला आठवां देश बना नाओएरो

‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ 21वीं सदी में अपना आधिकारिक नाम बदलने वाला दुनिया का आठवां देश बन गया है। इससे पहले वर्ष 2022 में तुर्किये (Türkiye) ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने नाम में बदलाव किया था। पिछले दो दशकों में कई देशों ने अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से नाम परिवर्तन का फैसला लिया है।

एक शादी के विवाद से शुरू हुआ था 10 साल लंबा गृहयुद्ध

19वीं सदी के अंतिम वर्षों तक नाओएरो एक छोटा द्वीप था, जहां 12 स्थानीय जनजातियां निवास करती थीं। उस समय यहां न तो आधुनिक शासन व्यवस्था थी और न ही कोई संगठित सेना। लोगों का जीवन मछली पकड़ने, नारियल की खेती और समुद्री संसाधनों पर आधारित था।

1870 के दशक में यूरोपीय व्यापारी यहां पहुंचे और व्यापार के साथ स्थानीय लोगों को शराब और हथियार उपलब्ध कराने लगे। इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होने लगा।

वर्ष 1878 में एक शादी समारोह के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों को लेकर विवाद हुआ। बहस के दौरान एक व्यक्ति ने गोली चला दी, जिसमें एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई। स्थानीय परंपरा के अनुसार हत्या का बदला लेना सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था। यही घटना आगे चलकर पूरे द्वीप में फैले खूनी संघर्ष की वजह बनी।

यह संघर्ष धीरे-धीरे सभी 12 जनजातियों के बीच गृहयुद्ध में बदल गया और लगभग 10 वर्षों तक चलता रहा। इतिहास में इसे ‘नाउरू सिविल वॉर’ के नाम से जाना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, कई गांव उजड़ गए और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में हिंसा की चपेट में आया।

आखिरकार वर्ष 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप करते हुए द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया, हथियार जब्त किए और लंबे समय से चल रहे इस संघर्ष का अंत कराया।

जर्मनी के बाद ऑस्ट्रेलिया के नियंत्रण में आया देश

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। ऑस्ट्रेलियाई सेना ने बिना बड़े प्रतिरोध के नाओएरो पर कब्जा कर लिया। युद्ध समाप्त होने पर जर्मनी को अपने कई विदेशी उपनिवेश छोड़ने पड़े और यह द्वीप लंबे समय तक विदेशी प्रशासन के अधीन रहा।

करीब पांच दशकों तक बाहरी शासन झेलने के बाद 31 जनवरी 1968 को नाओएरो को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ।

फॉस्फेट की खोज ने बदल दी देश की किस्मत

वर्ष 1900 में ऑस्ट्रेलियाई भूवैज्ञानिक अल्बर्ट फुलर एलिस ने नाओएरो में फॉस्फेट के विशाल भंडार की खोज की। इसके छह साल बाद व्यावसायिक खनन शुरू हुआ। उस समय कृषि क्षेत्र में उर्वरक के रूप में फॉस्फेट की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही थी। इसी वजह से यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के प्रमुख फॉस्फेट निर्यातकों में शामिल हो गया।

आजादी के बाद सरकार ने धीरे-धीरे फॉस्फेट उद्योग पर नियंत्रण स्थापित किया। 1970 के दशक तक फॉस्फेट से होने वाली भारी कमाई ने नाओएरो को दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में शामिल कर दिया। प्रति व्यक्ति आय कई विकसित देशों के बराबर पहुंच गई। शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं लगभग मुफ्त उपलब्ध कराई जाने लगीं। देश ने विदेशों में होटल, व्यावसायिक इमारतों और अन्य संपत्तियों में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया।

जिस खनिज ने बनाया अमीर, उसी ने पहुंचाया आर्थिक संकट में

समय के साथ लगातार खनन के कारण फॉस्फेट के भंडार तेजी से समाप्त होने लगे। देश की सबसे बड़ी आय का स्रोत कमजोर पड़ गया। दूसरी ओर विदेशों में किए गए कई निवेश भी अपेक्षित लाभ नहीं दे सके।

1990 के दशक तक नाओएरो गंभीर आर्थिक संकट का सामना करने लगा। जिस फॉस्फेट ने कभी इस छोटे से देश को दुनिया के सबसे समृद्ध राष्ट्रों की सूची में पहुंचाया था, उसके खत्म होने के बाद आर्थिक चुनौतियां लगातार बढ़ती चली गईं। आज भी यह द्वीपीय राष्ट्र उस दौर के प्रभाव से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है।

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