रोशनी का महापर्व दीवाली (Diwali 2026) केवल भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई अन्य पौराणिक कथाएं भी बेहद खास महत्व रखती हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प और कम चर्चित कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और महान असुर राजा महाबली (Raja Bali) से जुड़ी है। क्या आप जानते हैं कि दिवाली के पावन अवसर पर देश के कुछ हिस्सों में देवताओं के विरोधी माने जाने वाले एक असुर राजा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उनके स्वागत में दीये जलाए जाते हैं? आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा और राजा बलि की पूरी दास्तान।
कौन थे राजा बलि?
हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, राजा बलि कोई साधारण असुर या राक्षस नहीं थे, बल्कि वे भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते और विरोचन के पुत्र थे।
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न्यायप्रिय और प्रतापी शासक: अपने दादा प्रह्लाद की तरह ही राजा बलि के मन में भी धर्म और प्रजा के प्रति अगाध प्रेम था। उनके राज्य में प्रजा बेहद खुशहाल, समृद्ध और सुरक्षित थी। उन्हें एक अत्यंत दानी, पराक्रमी और न्यायप्रिय शासक के रूप में जाना जाता था।
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तीनों लोकों पर आधिपत्य: अपनी कड़ी तपस्या और शक्ति के बल पर राजा बलि ने पृथ्वी और पाताल के साथ-साथ स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया था, जिससे देवराज इंद्र समेत सभी देवी-देवता चिंतित हो गए थे।
वामन अवतार और तीन पग भूमि की कथा
जब राजा बलि के बढ़ते प्रभाव से देवताओं का सिंहासन डोलने लगा, तो सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उनकी रक्षा करें। इसके बाद भगवान विष्णु ने ब्राह्मण के वेश में वामन अवतार लिया और राजा बलि के पास पहुंचे:
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दान की परीक्षा: वामन भगवान ने राजा बलि से दान में केवल ‘तीन पग’ (तीन कदम) भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान वामन को पहचान लिया था और बलि को आगाह भी किया था, लेकिन एक वचनबद्ध और दानी राजा होने के नाते बलि पीछे नहीं हटे और उन्होंने दान देने का संकल्प ले लिया।
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तीनों लोकों को नापना: संकल्प लेते ही वामन भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर लिया और पहले दो पग में ही पूरी पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो वचन का पक्का होने के कारण राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में झुका दिया और कहा कि वे तीसरे पग के रूप में उनके सिर पर पैर रखें।
दिवाली से क्या है राजा बलि का संबंध?
राजा बलि की इस अपार उदारता, वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक बड़ा वरदान दिया:
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पाताल लोक के स्वामी: भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का आधिपत्य सौंप दिया।
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पृथ्वी पर लौटने का वरदान: राजा बलि के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने उन्हें यह वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार (विशेषकर दीपावली या उसके आसपास के दिनों में) अपनी प्रजा से मिलने और उनका हालचाल जानने के लिए पृथ्वी पर आ सकेंगे।
यही वजह है कि कई क्षेत्रों में बलि की इस वापसी और उनकी प्रजावत्सलता के सम्मान में दीये जलाए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है, ताकि उनके राज्य में सुख-समृद्धि बनी रहे।
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