योगी बनाम अंधविश्वास: मुलायम-अखिलेश जिस नोएडा से कांपते थे, वहां 25 बार जाकर सीएम योगी ने कैसे तोड़ा 38 साल पुराना ‘मनहूस’ मिथक?

लखनऊ/नोएडा: उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘नोएडा’ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि दशकों तक मुख्यमंत्रियों के लिए एक ऐसा ‘हौवा’ बना रहा जिससे बड़े-बड़े दिग्गज नेता भी खौफ खाते थे। एक ऐसा अंधविश्वास जिसने मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक के कदमों को दिल्ली की सीमा पर ही रोक दिया। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल इस मिथक को चुनौती दी, बल्कि 25 से ज्यादा बार नोएडा का दौरा कर यह साबित कर दिया कि ‘कुर्सी’ कर्म से बचती है, अंधविश्वास से नहीं। लखनऊ के लोक भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में सीएम योगी ने विपक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए इस 35 साल पुराने ‘नोएडा जिंक्स’ (Noida Jinx) की परतें खोल दीं।

वीर बहादुर सिंह से शुरू हुआ था ‘कुर्सी जाने’ का खौफ

इस दिलचस्प और डरावने अंधविश्वास की कहानी साल 1988 से शुरू होती है। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह जून 1988 में एक कार्यक्रम के लिए नोएडा आए थे। इत्तेफाक ऐसा हुआ कि लखनऊ लौटते ही अगले दिन उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके ठीक एक साल बाद 1989 में एनडी तिवारी नोएडा आए और उनकी भी सत्ता चली गई। इन दो बैक-टू-बैक घटनाओं ने यूपी के सियासी गलियारों में यह बात पत्थर की लकीर बना दी कि ‘जो नोएडा जाएगा, वो अपनी कुर्सी गंवाएगा’। इसके बाद तो कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता भी इस शहर की सरजमीं पर कदम रखने से कतराने लगे।

मुलायम से अखिलेश तक: आधुनिकता पर भारी पड़ा डर

नोएडा का यह डर इतना गहरा था कि करोड़ों की योजनाओं के फीते या तो लखनऊ से कटते थे या फिर दिल्ली के होटलों से। मुलायम सिंह यादव ने अपने तीन बार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में कभी नोएडा आने का साहस नहीं दिखाया। वहीं, ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर लौटे और खुद को आधुनिक सोच का पैरोकार बताने वाले अखिलेश यादव भी इस मामले में पुराने ढर्रे पर ही चले। साल 2012 से 2017 के बीच अखिलेश ने मेट्रो विस्तार और एक्सप्रेसवे जैसे दर्जनों प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया, लेकिन कभी नोएडा की सीमा में प्रवेश नहीं किया। हद तो तब हो गई जब 2013 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नोएडा आए, तब भी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अखिलेश उनके स्वागत के लिए वहां नहीं पहुंचे।

मायावती की ‘हिम्मत’ और 2012 की हार ने बढ़ाया डर

साल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इस मिथक को तोड़ने की कोशिश की थी। वे दलित प्रेरणा स्थल के उद्घाटन के लिए नोएडा आईं। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की करारी हार ने इस अंधविश्वास को और ज्यादा खाद-पानी दे दिया। राजनीतिक पंडितों ने इसे ‘नोएडा का श्राप’ करार दिया, जिससे बाद के मुख्यमंत्रियों का डर दोगुना हो गया।

योगी का ‘रिकॉर्ड ब्रेकिंग’ प्रहार: 25 दौरे और प्रचंड वापसी

2017 में सत्ता संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ ने साफ कर दिया था कि वे किसी भी तरह के अंधविश्वास को नहीं मानते। दिसंबर 2017 में जब वे प्रधानमंत्री मोदी के साथ मेट्रो की ‘मैजेंटा लाइन’ के उद्घाटन के लिए नोएडा पहुंचे, तो विपक्ष ने चुटकी ली कि अब योगी की विदाई तय है। लेकिन 2022 के चुनावों में योगी न केवल प्रचंड बहुमत के साथ लौटे, बल्कि उन्होंने नोएडा को उत्तर प्रदेश की ‘आर्थिक राजधानी’ में बदल दिया। जेवर एयरपोर्ट से लेकर एशिया के सबसे बड़े डेटा सेंटर तक, योगी अब तक 25 से अधिक बार नोएडा आ चुके हैं, और हर बार उन्होंने उस तीन दशक पुराने ‘मनहूस’ मिथक की कब्र को और गहरा खोदा है।

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