
नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026: दिल्ली हाई कोर्ट में बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान कई अहम सवाल उठे। अदालत ने दोनों नेताओं से पूछा कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया जा चुका था, तो वे वहां विरोध प्रदर्शन करने क्यों पहुंचे? अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरा था, तो उसके कथित उल्लंघन के बाद प्रशासन की सख्त कार्रवाई पर आपत्ति क्यों जताई जा रही है?
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने प्रदर्शन के उद्देश्य, आयोजकों की जिम्मेदारी, कानून-व्यवस्था और विरोध प्रदर्शन के लिए उपलब्ध वैकल्पिक स्थानों को लेकर सवाल किए। सुनवाई में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा से जुड़ा मामला भी शामिल था।
बॉन्ड भरने के बाद प्रदर्शन करने क्यों पहुंचे जंतर-मंतर?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रांका के आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के बाद यदि उसका उल्लंघन होता है, तो अधिकारियों की ओर से ज्यादा सख्त बॉन्ड की मांग किए जाने पर आपत्ति का आधार क्या है?
अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं रखा गया था, तब वहां जाकर प्रदर्शन करने की जरूरत क्यों पड़ी। पीठ की टिप्पणियों का केंद्र यह था कि किसी विरोध प्रदर्शन के उद्देश्य के साथ-साथ उसे आयोजित करने के तरीके और कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
दोनों नेताओं को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की कोशिश और बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
दो किलोमीटर दूर दूसरे मैदानों में प्रदर्शन का विकल्प था
दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी सवाल किया कि प्रदर्शन करने के लिए दूसरे निर्धारित स्थानों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया। अदालत के सामने यह मुद्दा उठा कि जंतर-मंतर के बजाय रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थान उपलब्ध थे।
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटाने के बाद इन मैदानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में घोषित किया था। अदालत ने पूछा कि जब दूसरे स्थानों पर प्रदर्शन करने का विकल्प मौजूद था, तो संबंधित अधिकारियों के सामने निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के बजाय विवादित स्थल पर जाने का फैसला क्यों किया गया।
इस सवाल के जरिए अदालत ने प्रदर्शन करने के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू प्रतिबंधों के बीच संतुलन के मुद्दे को सामने रखा।
बैरिकेड तोड़ने पर कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने बैरिकेडिंग और भीड़ के व्यवहार को लेकर भी अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि बैरिकेड किसी विशेष उद्देश्य से लगाए जाते हैं और उन्हें तोड़ने की कोशिश से वहां अधिक लोगों के जुटने की आशंका पैदा हो सकती है।
पीठ ने चिंता जताई कि प्रदर्शन के आयोजकों के नियंत्रण से बाहर के लोग भी मौके पर पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में विरोध प्रदर्शन का स्वरूप बदलने और कानून-व्यवस्था बिगड़ने का जोखिम बढ़ सकता है।
अदालत ने विदेशों में हुए प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ जगहों पर छात्र आंदोलन के रूप में शुरू हुए प्रदर्शन बाद में आगजनी और लूटपाट जैसी घटनाओं में बदल गए। कोर्ट की टिप्पणी का संदर्भ यह था कि किसी आंदोलन के शुरुआती उद्देश्य के साथ-साथ उसके आगे बढ़ने पर पैदा होने वाली परिस्थितियों का भी आकलन करना जरूरी है।
जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने के बजाय हाई कोर्ट क्यों आए?
पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से अपनाए गए कानूनी रास्ते पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि यदि उन्हें प्रशासनिक आदेश या संबंधित कार्यवाही पर आपत्ति थी, तो वे जिला मजिस्ट्रेट के सामने रिवीजन याचिका दाखिल करने जैसे उपलब्ध विकल्पों पर विचार क्यों नहीं कर सके।
इस पर CJP नेताओं के वकील ने दलील दी कि मामले में यह देखना जरूरी है कि कानून को किस तरह लागू किया जा रहा है। बचाव पक्ष ने धारा 135 के तहत कार्यवाही दो बार लागू किए जाने का मुद्दा भी उठाया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह परखने की कोशिश की कि हिरासत और शांति बनाए रखने के लिए लागू की गई प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए कौन-से कानूनी उपाय उपलब्ध थे और याचिका सीधे हाई कोर्ट में लाने का आधार क्या था।
‘आप Gen-Z नहीं हैं’, नेताओं की उम्र पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र के बारे में भी पूछा। जब पीठ को बताया गया कि दोनों की उम्र क्रमशः 27 और 31 वर्ष है, तो अदालत ने टिप्पणी की कि वे Gen-Z नहीं हैं और मिलेनियल्स की उम्र-सीमा को लेकर भी सवाल किया।
अदालत ने प्रदर्शन के बदलते स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आंदोलन में शामिल लोग वही हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ आंदोलन का उद्देश्य बदल सकता है। पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि कोई प्रदर्शन शुरुआत में छात्रों से जुड़ा था, तो बाद में उसका एजेंडा किस तरह बदल गया।
ये टिप्पणियां प्रदर्शन के आयोजकों की भूमिका, आंदोलन के उद्देश्य और उसके वर्तमान स्वरूप को लेकर अदालत की चिंता को दर्शाती हैं। सुनवाई के दौरान इन सवालों का इस्तेमाल मामले की परिस्थितियों और शांति भंग होने की आशंका का आकलन करने के संदर्भ में किया गया।
CJP संगठन और उसके उद्देश्य पर भी उठे सवाल
हाई कोर्ट ने केवल प्रदर्शन स्थल और बॉन्ड के उल्लंघन तक ही सवाल सीमित नहीं रखे। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के संगठन, उसकी पहचान, उसके उद्देश्यों और उसकी गतिविधियों के बारे में भी सवाल किए।
पीठ की टिप्पणी थी कि जब किसी मामले में शांति भंग होने की आशंका का आकलन किया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका, उनकी संगठनात्मक संबद्धता और संगठन के उद्देश्य जैसे पहलुओं का महत्व हो सकता है।
अदालत ने इस संदर्भ में यह जानने की कोशिश की कि प्रदर्शन के पीछे कौन-सा संगठन था, उसकी गतिविधियों का उद्देश्य क्या था और आंदोलन का एजेंडा किस तरह आगे बढ़ा। इन सवालों के जरिए अदालत ने मामले के व्यापक संदर्भ को समझने पर जोर दिया।
नेहा बोरा की याचिका का मामला भी सुनवाई में शामिल
CJP नेताओं की हिरासत से संबंधित याचिका के साथ AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की ओर से दायर याचिका का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान उठा। नेहा बोरा की याचिका 10,000 रुपये के बॉन्ड से संबंधित थी। इस मामले में मजिस्ट्रेट की कार्यवाही और संबंधित आदेश को चुनौती दी गई थी।
इस तरह सुनवाई में केवल सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत का मुद्दा ही नहीं, बल्कि प्रदर्शन से जुड़े दूसरे छात्र नेताओं के खिलाफ अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई।
अलग-अलग याचिकाओं में उठाए गए सवालों के बीच शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड, हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया और प्रशासनिक आदेशों को चुनौती देने के उपलब्ध कानूनी विकल्प महत्वपूर्ण विषय बने रहे।
क्या है पूरा मामला?
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की कोशिश के बाद हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया जा चुका था। प्रदर्शनकारियों की ओर से बैरिकेड पार करने की घटना भी मामले के केंद्र में रही।
दोनों नेताओं पर शांति बनाए रखने से संबंधित बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया गया।
यह विवाद चुनाव आयोग और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में सामने आया। CJP और उससे जुड़े प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में बदलावों को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग ने चुनावी प्रक्रिया में किसी राजनीतिक दल को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों को खारिज किया है।
सुनवाई के दौरान क्या रहा अहम?
दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से पांच मुद्दे सामने आए। पहला, बॉन्ड भरने के बाद उसके कथित उल्लंघन का सवाल। दूसरा, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बावजूद वहां पहुंचने का निर्णय। तीसरा, दूसरे निर्धारित मैदानों पर प्रदर्शन करने का विकल्प। चौथा, बैरिकेड तोड़ने से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका। और पांचवां, हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने के लिए अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया।
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार, प्रशासनिक प्रतिबंधों और सार्वजनिक शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर ध्यान केंद्रित किया। मामले में संबंधित पक्षों की दलीलें और कानूनी प्रक्रिया आगे की कार्रवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।
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