नेचिरवान बरजानी कौन हैं? ट्रंप ने ईरान के IRGC तक पहुंचने के लिए क्यों लिया उनका सहारा, जानें सीक्रेट बातचीत की पूरी कहानी

अमेरिका-ईरान बातचीत में सामने आया बड़ा सीक्रेट बैकचैनल, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य संगठन IRGC तक पहुंचने के लिए इराकी कुर्दिस्तान के राष्ट्रपति नेचिरवान बरजानी का सहारा लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, बरजानी ने IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से सुरक्षित माध्यम से बातचीत कर यह पता लगाने की कोशिश की कि ईरान के आधिकारिक वार्ताकार वास्तव में रिवोल्यूशनरी गार्ड की मंजूरी के साथ बातचीत कर रहे थे या नहीं।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध और तनाव खत्म करने को लेकर चल रही बातचीत के दौरान पर्दे के पीछे एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने तेहरान की सत्ता के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका होने लगी थी कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे प्रतिनिधियों के पास किसी समझौते को अंतिम रूप देने की पूरी ताकत नहीं है। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने आधिकारिक बातचीत से अलग एक गुप्त चैनल तैयार करने की कोशिश की।

इस सीक्रेट बैकचैनल के लिए अमेरिका ने इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवान बरजानी को चुना। अमेरिकी प्रशासन का मानना था कि बरजानी के ईरान और अमेरिका, दोनों पक्षों में संपर्क हैं और वह तेहरान के प्रभावशाली अधिकारियों तक संदेश पहुंचा सकते हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसी रास्ते से अमेरिका की सीधी पहुंच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के वरिष्ठ नेतृत्व तक बनी।

अमेरिका को आखिर IRGC से अलग से बात करने की जरूरत क्यों पड़ी?

मई के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत चल रही थी। ईरानी पक्ष की तरफ से संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची बातचीत में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। लेकिन अमेरिकी वार्ताकारों को संदेह होने लगा कि जिन मुद्दों पर बातचीत हो रही है, उन पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार इन प्रतिनिधियों के पास है या नहीं।

अमेरिकी पक्ष को यह भी आशंका थी कि ईरानी वार्ताकार किसी समझौते पर सहमत होने के बाद IRGC की मंजूरी न मिलने की स्थिति में उसे लागू नहीं कर पाएंगे। ऐसे में वॉशिंगटन के सामने सवाल था कि ईरान की ओर से वास्तव में अंतिम निर्णय कौन ले सकता है।

यहीं से सीक्रेट बैकचैनल की जरूरत महसूस हुई। Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने IRGC नेतृत्व से समानांतर संपर्क स्थापित करने का फैसला किया और इसके लिए नेचिरवान बरजानी को माध्यम बनाया।

नेचिरवान बरजानी कौन हैं?

नेचिरवान बरजानी इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति हैं। वह लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं और ईरान के साथ उनके पुराने संबंधों को इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बरजानी की सबसे बड़ी खासियतों में से एक उनका ईरान के साथ पुराना व्यक्तिगत और राजनीतिक संपर्क है। ईरान-इराक युद्ध के दौरान वह ईरान में रहे थे और उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। उन्हें फारसी भाषा की अच्छी समझ है और ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके संपर्क बताए जाते हैं।

यही वजह थी कि वह अमेरिका के लिए ऐसे समय में उपयोगी मध्यस्थ साबित हो सकते थे, जब वॉशिंगटन को तेहरान के सैन्य नेतृत्व तक सीधे पहुंच बनाने में मुश्किल हो रही थी। रिपोर्टों में बरजानी को ऐसा नेता बताया गया है, जिसके संपर्क वॉशिंगटन और तेहरान दोनों जगह हैं।

तुलसी गैबर्ड ने बरजानी को क्यों किया फोन?

रिपोर्ट के मुताबिक, मई की शुरुआत में तत्कालीन अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गैबर्ड ने नेचिरवान बरजानी से फोन पर संपर्क किया। यह बातचीत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तत्कालीन उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मंजूरी से होने की बात कही गई है।

गैबर्ड ने बरजानी से यह पता लगाने में मदद मांगी कि IRGC नेतृत्व ईरानी वार्ताकारों की बातचीत और संभावित समझौते से सहमत है या उसके पास अपनी अलग शर्तें और मांगें हैं।

अमेरिका की खास दिलचस्पी IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी की स्थिति जानने में थी। अमेरिकी वार्ताकार सीधे वाहिदी तक पहुंचने में सफल नहीं हो पा रहे थे। इसलिए बरजानी को संपर्क का माध्यम बनाया गया।

बरजानी ने कैसे बनाई IRGC से सीधी लाइन?

गैबर्ड से बातचीत के बाद बरजानी ने ईरान में अपने संपर्कों का इस्तेमाल किया। उन्होंने IRGC के अधिकारियों तक अमेरिकी संदेश पहुंचाया और कथित तौर पर सीधे जनरल अहमद वाहिदी से बात करने की इच्छा जताई।

इसके बाद 14 मई को इराकी कुर्दिस्तान की राजधानी एरबिल में बरजानी के कार्यालय में IRGC का एक अधिकारी पहुंचा। उसके पास सुरक्षित संचार के लिए एन्क्रिप्टेड फोन था। इसी सुरक्षित माध्यम से बरजानी की जनरल वाहिदी से बातचीत कराई गई।

बरजानी ने वाहिदी से यह जानना चाहा कि क्या वह ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची की लाइन से सहमत हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वाहिदी ने बातचीत का समर्थन किया और कहा कि IRGC भी संकट का समाधान बातचीत के जरिए निकालने के पक्ष में है। इसके बाद बरजानी ने यह जानकारी अमेरिकी पक्ष तक पहुंचाई।

अमेरिका ने एरबिल में गुप्त बैठक का बनाया प्लान

IRGC नेतृत्व से संपर्क स्थापित होने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने एक और कदम आगे बढ़ाने की कोशिश की। अमेरिका चाहता था कि एरबिल में अमेरिकी और ईरानी वरिष्ठ अधिकारियों के बीच गुप्त बैठक कराई जाए।

बरजानी ने इस प्रस्ताव को ईरानी पक्ष तक पहुंचाया। इससे अमेरिका को उम्मीद थी कि आधिकारिक बातचीत के समानांतर वरिष्ठ स्तर पर सीधे संवाद का रास्ता खुल सकता है।

लेकिन यह बैठक आखिरकार नहीं हो सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी पक्ष ने सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई। उसे आशंका थी कि इराकी कुर्दिस्तान में इजरायली खुफिया नेटवर्क सक्रिय हो सकता है और ईरानी अधिकारियों को एरबिल पहुंचने, वहां रहने या वापस लौटने के दौरान निशाना बनाया जा सकता है। इसलिए प्रस्तावित गुप्त बैठक आगे नहीं बढ़ सकी।

इस पूरे घटनाक्रम से क्या पता चलता है?

अमेरिका की यह कोशिश केवल एक गुप्त बातचीत की कहानी नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन के सामने ईरान के साथ बातचीत में सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना भी थी कि तेहरान में वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति किसके पास है।

अमेरिका ने जब यह मानना शुरू किया कि आधिकारिक ईरानी वार्ताकारों के पास अंतिम समझौते की पूरी शक्ति नहीं हो सकती, तब उसने सीधे IRGC नेतृत्व की स्थिति जानने की कोशिश की। ऐसे में बरजानी का इस्तेमाल एक भरोसेमंद क्षेत्रीय मध्यस्थ के तौर पर किया गया।

IRGC ईरान की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में बेहद प्रभावशाली संगठन है। इसलिए किसी भी बड़े सैन्य या रणनीतिक समझौते के लिए उसके रुख को समझना अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

बरजानी की भूमिका क्यों अहम मानी जा रही है?

नेचिरवान बरजानी की भूमिका इसलिए भी खास है क्योंकि वह केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक नेता नहीं हैं, बल्कि उनके ईरान के साथ लंबे समय से संबंध हैं। ईरान में उनका रहना, तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करना, फारसी भाषा का ज्ञान और ईरानी अधिकारियों के साथ संपर्क उन्हें ऐसे संवेदनशील संवाद के लिए उपयुक्त बनाता है।

दूसरी ओर, कुर्दिस्तान क्षेत्र के अमेरिका के साथ भी लंबे समय से रणनीतिक संबंध रहे हैं। इस वजह से बरजानी दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने वाले ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं, जिनके जरिए औपचारिक कूटनीतिक चैनल के बाहर भी बातचीत संभव हो।

यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन ने ईरानी वार्ताकारों से सीधे आगे बढ़कर IRGC तक पहुंचने के लिए बरजानी का सहारा लिया।

आगे भी काम आ सकता है यह सीक्रेट चैनल

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में बरजानी की भूमिका भविष्य में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने हाल में व्हाइट हाउस को फिर से बातचीत शुरू कराने में मदद की पेशकश की है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि ईरान के साथ किसी भी संभावित समझौते में केवल आधिकारिक राजनयिक वार्ताकारों से बातचीत पर्याप्त नहीं हो सकती। अमेरिका के लिए IRGC और ईरान की सत्ता के दूसरे प्रभावशाली केंद्रों की सहमति भी अहम हो सकती है।नेचिरवान बरजानी के जरिए बना यह गुप्त संपर्क इसी जटिल शक्ति समीकरण को समझने की अमेरिकी कोशिश का हिस्सा था। हालांकि, एरबिल में प्रस्तावित अमेरिकी-ईरानी गुप्त बैठक नहीं हो सकी, लेकिन इस बैकचैनल ने वॉशिंगटन को IRGC के रुख के बारे में सीधे जानकारी हासिल करने का रास्ता जरूर दिया।

Check Also

अफगानिस्तान में तालिबान राज के 5 साल: महिलाओं की आजादी से प्रेस की स्वतंत्रता तक, कैसे बदली देश की तस्वीर?

काबुल | 15 अगस्त 2026 अफगानिस्तान में तालिबान के काबुल पर कब्जे को आज पांच …