
इस्लामाबाद में 21 घंटे चली मैराथन वार्ता, अंत में निराशा
तेहरान/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में हुई हाई-लेवल वार्ता से दुनिया को बड़ी उम्मीदें थीं। करीब 21 घंटे तक चली गहन बातचीत के बाद संकेत मिल रहे थे कि दोनों देश किसी ठोस समझौते के करीब पहुंच चुके हैं। लेकिन 12 अप्रैल की सुबह अचानक तस्वीर बदल गई, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता समाप्त होने और किसी भी तरह का समझौता न हो पाने की घोषणा कर दी।वेंस ने इस विफलता के लिए ईरान पर शर्तें न मानने का आरोप लगाया, जिससे कूटनीतिक हलकों में निराशा फैल गई।
ईरान का बड़ा आरोप: एक फोन कॉल ने बदल दिया पूरा समीकरण
अब इस पूरे घटनाक्रम में नया मोड़ आया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दावा किया है कि वार्ता के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की एक फोन कॉल ने हालात पूरी तरह बदल दिए।अराघची के मुताबिक, यह कॉल अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को की गई थी, जिसके बाद बातचीत का फोकस अचानक बदल गया और समझौते की दिशा कमजोर पड़ गई। हालांकि, अमेरिका की ओर से इस कॉल की न तो पुष्टि की गई है और न ही इसका खंडन किया गया है।
“इस्लामाबाद समझौता” लगभग तैयार था
ईरानी विदेश मंत्री का कहना है कि प्रस्तावित “इस्लामाबाद एमओयू” लगभग तैयार हो चुका था और दोनों पक्ष अंतिम सहमति के बेहद करीब थे। उनका दावा है कि अगर बातचीत के दौरान शर्तों में लगातार बदलाव नहीं किए जाते, तो यह ऐतिहासिक डील संभव हो सकती थी।तेहरान का संकेत है कि वार्ता के अंतिम चरण में अचानक आई अड़चनों ने पूरे प्रयास पर पानी फेर दिया।
आखिरी पलों में बदला खेल, बढ़ा तनाव
अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि 47 वर्षों में यह सबसे उच्च स्तर की वार्ता थी, जिसमें ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए पूरी नीयत के साथ भाग लिया।उन्होंने आरोप लगाया कि जब समझौता कुछ ही कदम दूर था, तभी “गोलपोस्ट बदल दिए गए” और नई बाधाएं खड़ी कर दी गईं। उनके अनुसार, इस तरह के रवैये से कूटनीतिक विश्वास को नुकसान पहुंचता है।
क्या इजरायल के हित बने वार्ता में बाधा?
ईरान का यह भी कहना है कि नेतन्याहू की कथित कॉल के बाद वार्ता का ध्यान अमेरिका-ईरान मुद्दों से हटकर इजरायल के हितों पर केंद्रित हो गया।यह दावा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस को जन्म दे सकता है, खासकर उस समय जब मध्य पूर्व पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति से गुजर रहा है।
अमेरिका की चुप्पी से बढ़े सवाल
पूरे मामले में अमेरिका की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान के आरोपों में सच्चाई है, तो यह वैश्विक कूटनीति में बाहरी हस्तक्षेप का बड़ा उदाहरण बन सकता है।
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