
कोलकाता। असफल प्रेम संबंधों को आपराधिक मुकदमे में बदलने की प्रवृत्ति पर सख्त टिप्पणी करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि हर टूटे रिश्ते को आपराधिक रंग देना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्तियों के बीच सहमति से संबंध बने हों और बाद में रिश्ता खत्म हो जाए, तो मात्र संबंध विच्छेद के आधार पर आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। अदालत की इस टिप्पणी को रिश्तों से जुड़े आपराधिक मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।
सहमति और आपराधिक मंशा में फर्क समझना जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि सहमति से बने संबंध और आपराधिक कृत्य के बीच स्पष्ट अंतर है। यदि किसी संबंध में प्रारंभ से ही धोखा देने या शोषण की मंशा सिद्ध न हो, तो केवल संबंध टूटने के आधार पर गंभीर धाराएं लगाना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदले या भावनात्मक आघात की भरपाई के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
हर असफल रिश्ता अपराध नहीं
अदालत ने कहा कि प्रेम संबंधों का बनना और टूटना सामाजिक वास्तविकता है। हर असफल संबंध को दुष्कर्म या धोखाधड़ी जैसे अपराधों की श्रेणी में रखना न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कानून का उद्देश्य वास्तविक अपराधों पर कार्रवाई करना है, न कि व्यक्तिगत संबंधों की जटिलताओं को आपराधिक मुकदमे का रूप देना।
न्यायिक संतुलन की आवश्यकता
पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों और निचली अदालतों को तथ्यों की गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए। यदि यह साबित हो कि संबंध सहमति से बना और बाद में परिस्थितियों या मतभेदों के कारण समाप्त हुआ, तो इसे स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रारंभ से ही छल, झूठे वादे या दबाव के प्रमाण हों, तो कानून के तहत कार्रवाई संभव है।
कानून के दुरुपयोग पर चिंता
अदालत की टिप्पणी को आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग पर चिंता के रूप में भी देखा जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि भावनात्मक विवादों को आपराधिक मुकदमे का रूप देना न्यायिक प्रक्रिया के मूल उद्देश्य के विपरीत है। इस फैसले से भविष्य में प्रेम संबंधों से जुड़े मामलों में पुलिस और अदालतों को दिशा-निर्देश मिलने की उम्मीद है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी उन मामलों में महत्वपूर्ण साबित होगी, जहां रिश्तों के टूटने के बाद गंभीर धाराएं लगाई जाती हैं। अदालत ने संकेत दिया कि कानून का इस्तेमाल सोच-समझकर और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्ति अनावश्यक मुकदमों में न फंसें।
Hindustan Awaaz – ताज़ा हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया