नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के सबसे वीआईपी इलाके लुटियंस दिल्ली में स्थित जयपुर पोलो ग्राउंड के आसपास रहने वाले करीब 700 परिवारों के सामने बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है। प्रशासनिक कार्रवाई और संभावित हटाने की प्रक्रिया की खबरों के बाद पूरी बस्ती में भय और अनिश्चितता का माहौल है। वर्षों से यहां रह रहे लोगों का कहना है कि यदि उन्हें यहां से हटाया गया तो सिर्फ उनका आशियाना ही नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का सहारा भी छिन जाएगा।
पीढ़ियों से रह रहे परिवारों में बढ़ी चिंता
बस्ती के निवासियों का दावा है कि उनके परिवार कई पीढ़ियों से इस इलाके में रह रहे हैं। कई बुजुर्गों का कहना है कि उनके पूर्वज अंग्रेजों के शासनकाल से यहां बसे हुए हैं। ऐसे में अचानक विस्थापन की आशंका ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में बिताया है। बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और सामाजिक जीवन सब कुछ इसी इलाके से जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी दूर स्थान पर पुनर्वास उनके लिए नई परेशानियां खड़ी कर सकता है।
आजीविका पर सबसे बड़ा खतरा
झुग्गी बस्ती में रहने वाले अधिकांश लोग घरेलू कामगार, ड्राइवर, माली, सुरक्षा कर्मचारी, सफाई कर्मचारी और छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े हैं। इनकी रोजी-रोटी आसपास के सरकारी आवासों, दफ्तरों और वीआईपी इलाकों पर निर्भर है।
निवासियों का कहना है कि यदि उन्हें शहर के बाहरी हिस्सों में भेजा गया तो रोजाना काम पर पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। इससे रोजगार छिनने और आय प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाएगा। लोगों का आरोप है कि पुनर्वास की योजनाओं में आजीविका से जुड़े पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
जयपुर पोलो ग्राउंड को लेकर तेज हुई गतिविधियां
हाल के दिनों में जयपुर पोलो ग्राउंड को लेकर सरकारी स्तर पर गतिविधियां तेज हुई हैं। केंद्र सरकार के अधीन भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने हाल ही में इस प्रमुख भूखंड का कब्जा अपने हाथ में लिया है। बताया गया है कि यह भूमि बड़े सार्वजनिक उद्देश्यों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए आवश्यक है। इस कार्रवाई के बाद आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच भविष्य को लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं।
‘घर गया तो सब कुछ चला जाएगा’
बस्ती के कई परिवारों का कहना है कि उनके लिए मकान सिर्फ रहने की जगह नहीं है, बल्कि रोजगार का आधार भी है। महिलाओं का कहना है कि वे आसपास के घरों में काम करती हैं, जबकि पुरुष पास के इलाकों में नौकरी और मजदूरी करते हैं। ऐसे में दूरस्थ पुनर्वास उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है।
स्थानीय निवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि किसी भी कार्रवाई से पहले उनके भविष्य, रोजगार और बच्चों की शिक्षा को ध्यान में रखा जाए। उनका कहना है कि बिना पर्याप्त व्यवस्था के विस्थापन हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है।
पुनर्वास बनाम आजीविका की चुनौती
दिल्ली में अतिक्रमण और पुनर्वास से जुड़े मामलों में अक्सर सबसे बड़ी चुनौती आजीविका की होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आवास उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि रोजगार, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी समान रूप से महत्व देना आवश्यक है।
फिलहाल बस्ती के लोगों की निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। अनिश्चितता के इस माहौल में 700 परिवार अपने घर और भविष्य दोनों को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं।
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