
नोएडा: “सोचा था बेटे का जन्म नए घर में होगा, आज बेटा बड़ा हो गया लेकिन अपना आशियाना आज भी एक सपना ही है।” यह दर्द है नीलेश कुमार का, जिन्होंने 11 साल पहले अपनी गाढ़ी कमाई के 41 लाख रुपये सुपरटेक के प्रोजेक्ट में लगाए थे। नीलेश अकेले नहीं हैं, उनके जैसे करीब 51 हजार होम बायर्स पिछले एक दशक से खंडहर होते अपने सपनों के टॉवरों को देख रहे हैं। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने इन ‘अभागों’ की आंखों में फिर से चमक पैदा कर दी है। शीर्ष अदालत ने सुपरटेक के अधूरे 16 प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की जिम्मेदारी NBCC को सौंप दी है।
41 लाख दिए, फिर भी किराए के मकान में रहने को मजबूर
नीलेश कुमार ने एनडीटीवी से बातचीत में अपना दुख साझा करते हुए बताया कि उन्होंने साल 2014 में सुपरटेक इको विलेज-2 में फ्लैट बुक कराया था। 41 लाख की कुल कीमत में से वे 30 लाख रुपये कंपनी को दे चुके हैं, लेकिन आज भी वे किराए के मकान में रहने को मजबूर हैं। उन्होंने अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर निवेश किया था, ताकि बुढ़ापा सुरक्षित हो सके, लेकिन कंपनी के दिवालिया होने के बाद सब कुछ अधर में लटक गया। इन प्रोजेक्ट्स में 2-BHK फ्लैट्स 25-30 लाख और 3-BHK 40-45 लाख रुपये में बुक किए गए थे, जो आज खंडहर में तब्दील हो रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 12 से 36 महीने में मिलेगा घर
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आदेश दिया कि सुपरटेक के अधूरे प्रोजेक्ट्स, जिनमें इको विलेज 1, 2, 3 और स्पोर्ट्स सिटी जैसे बड़े नाम शामिल हैं, अब NBCC (National Buildings Construction Corporation) द्वारा पूरे किए जाएंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए फंड का इंतजाम बिना बिकी हुई इन्वेंट्री (Unsold Inventory), बायर्स से मिलने वाली बकाया राशि और एनबीसीसी के वित्तपोषण से किया जाएगा। अदालत ने इसके लिए 12 से 36 महीने की समय-सीमा तय की है, जिससे हजारों परिवारों को जल्द पजेशन मिलने की आस जगी है।
कैसे डूबी सुपरटेक और क्यों फंसे हजारों परिवार?
सुपरटेक की बर्बादी की कहानी साल 2010-2012 के बीच शुरू हुई, जब कंपनी ने ताबड़तोड़ कई बड़े प्रोजेक्ट्स लॉन्च किए और बायर्स से करोड़ों रुपये वसूले। आरोप है कि सुपरटेक ने यूनियन बैंक से प्रोजेक्ट्स के नाम पर 431 करोड़ रुपये का लोन लिया, लेकिन उस पैसे को उसी प्रोजेक्ट में लगाने के बजाय दूसरे कामों में मोड़ दिया। फंड की हेराफेरी और वित्तीय कुप्रबंधन के कारण साल 2022 में सुपरटेक को दिवालिया (Insolvent) घोषित कर दिया गया। इसके बाद से ही 51 हजार फ्लैट्स का काम ठप पड़ा था, जिसे अब दोबारा शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है।
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