
पाकिस्तान इस वक्त अंदरूनी अस्थिरता, आतंकवाद और आर्थिक बदहाली के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है, लेकिन इसी बीच उसकी सेना खुद को मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका यानी MENA रीजन में ‘सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के तौर पर पेश करने में जुटी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खुद मान चुके हैं कि बलूचिस्तान के बड़े हिस्से पर सरकार का नियंत्रण कमजोर पड़ चुका है, इसके बावजूद सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर खाड़ी देशों को सुरक्षा की गारंटी देने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तान में आतंक का कहर, राजधानी तक असुरक्षित
इस्लामाबाद से लेकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान तक हालात जंग जैसे बन चुके हैं। बीते हफ्ते राजधानी इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद में हुए भीषण बम धमाके में 30 से ज्यादा लोगों की मौत और 170 से अधिक के घायल होने की खबर ने देश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। यह तीन महीनों में राजधानी में दूसरा बड़ा आतंकी हमला था। लगातार हो रहे हमले यह साफ दिखाते हैं कि पाकिस्तान खुद अपने नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख पा रहा।
असीम मुनीर की MENA डिप्लोमेसी और हथियारों का प्रचार
देश के भीतर बढ़ते आतंक के बावजूद पाकिस्तानी सेना मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका में हथियारों की मार्केटिंग और रक्षा साझेदारी बढ़ाने में लगी है। इसी कड़ी में फरवरी के पहले हफ्ते में लीबिया के विद्रोही सैन्य कमांडर खलीफा हफ्तार की रावलपिंडी स्थित आर्मी हेडक्वार्टर में मेजबानी की गई। पाकिस्तान इसे अपनी MENA डिप्लोमेसी की बड़ी उपलब्धि बताकर पेश कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियार निर्यात को लेकर जोरदार प्रचार भी किया जा रहा है।
अरबों डॉलर की डील के दावे, हकीकत पर सवाल
पाकिस्तान का दावा है कि उसने लीबियाई नेशनल आर्मी के साथ करीब 4 अरब डॉलर की डील की है, जिसमें 16 JF-17 फाइटर जेट और 12 सुपर मुशक ट्रेनर एयरक्राफ्ट शामिल हैं। इसके अलावा सूडानी आर्म्ड फोर्सेज को 10 कराकोरम-8 लाइट अटैक एयरक्राफ्ट, 200 से ज्यादा ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम देने के लिए 1.5 अरब डॉलर की डील का भी दावा किया गया है। पाकिस्तान सऊदी अरब, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और इराक जैसे देशों के साथ भी संभावित रक्षा सौदों की बातें कर रहा है, हालांकि इन दावों की जमीनी हकीकत पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं।
खुद असुरक्षित, फिर कैसे बनेगा ‘सिक्योरिटी गारंटर’?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सेना खुद को MENA क्षेत्र में सुरक्षा की गारंटी देने वाला देश दिखाना चाहती है, जबकि देश के भीतर हालात काबू से बाहर हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का यह बयान कि बलूचिस्तान के 40 प्रतिशत से ज्यादा इलाके पर सरकार का प्रभाव कमजोर है, इस दावे की पोल खोल देता है। इसके बावजूद पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौतों और गाजा संकट जैसे मुद्दों में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
आर्थिक कमजोरी बनी सबसे बड़ी बाधा
विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान के पास इतने मजबूत आर्थिक संसाधन नहीं हैं कि वह लंबे समय तक इन रक्षा संबंधों को निभा सके। 2024-25 में पाकिस्तान का कुल नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट करीब 2.5 अरब डॉलर रहा, जबकि गल्फ देशों के साथ उसका कुल व्यापार लगभग 20 अरब डॉलर का था। इसके उलट भारत को सिर्फ 2024 में GCC देशों से 4.7 अरब डॉलर का निवेश मिला और भारत-गल्फ व्यापार 179 अरब डॉलर के करीब पहुंच गया। यही आर्थिक अंतर पाकिस्तान की सीमाएं साफ कर देता है।
बलूचिस्तान से इस्लामाबाद तक हिंसा की लहर
हाल के महीनों में बलूचिस्तान में एक साथ 12 शहरों में हुए हमलों ने पाकिस्तान की राजनीतिक और सुरक्षा अस्थिरता को और गहरा कर दिया। क्वेटा समेत कई इलाकों में प्रशासनिक भवनों और सुरक्षा ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके बाद इस्लामाबाद में शिया मस्जिद पर हमला हुआ, जिसकी जिम्मेदारी ISIS से जुड़े एक गुट ने ली। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान इस वक्त अफगानिस्तान, ISIS, बलूच लिबरेशन आर्मी और अन्य आतंकी संगठनों के बीच फंसा हुआ है।
पहले घर संभालो, फिर दुनिया की सुरक्षा
दक्षिण एशिया मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय रणनीतिक ‘बुरे सपने’ की स्थिति में है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा की अस्थिरता अब भारत-पाकिस्तान तनाव से भी ज्यादा खतरनाक रूप ले रही है। ऐसे में सवाल यही है कि जो देश खुद आतंक और अस्थिरता से जूझ रहा हो, वह दूसरों को सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकता है। विशेषज्ञों की साफ राय है कि पाकिस्तान को पहले अपने घर के हालात सुधारने होंगे, उसके बाद ही किसी और की सुरक्षा की बात करना समझदारी होगी।
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