
इस्लामाबाद: आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान इन दिनों एक बड़े कूटनीतिक धर्मसंकट में फंस गया है। एक ओर उसका पुराना सहयोगी सऊदी अरब है, जिसकी आर्थिक मदद पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से टिकी रही है। वहीं दूसरी ओर पड़ोसी देश ईरान के साथ रिश्ते सुधारने और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती सामने खड़ी है। आर्थिक संकट की गहराई और बढ़ती भू-राजनीतिक जटिलताओं के बीच पाकिस्तान को तय करना मुश्किल हो रहा है कि वह किस दिशा में कदम बढ़ाए।
आर्थिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। विदेशी मुद्रा भंडार सीमित है, महंगाई लगातार बढ़ रही है और कर्ज का बोझ सरकार पर भारी पड़ रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद को बार-बार अपने पारंपरिक सहयोगियों से आर्थिक मदद की उम्मीद करनी पड़ती है। सऊदी अरब ने अतीत में कई बार पाकिस्तान को वित्तीय सहायता, तेल की आपूर्ति और निवेश के जरिए राहत दी है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए रियाद के साथ रिश्ते बेहद अहम माने जाते हैं।
ईरान के साथ संबंधों का समीकरण
दूसरी तरफ पाकिस्तान का पड़ोसी देश ईरान भी क्षेत्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। दोनों देशों की लंबी सीमा साझा है और सुरक्षा से लेकर ऊर्जा तक कई मुद्दों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन जैसे प्रोजेक्ट लंबे समय से चर्चा में हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के कारण यह परियोजना अब तक आगे नहीं बढ़ पाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान ईरान के साथ रिश्तों को मजबूत करता है तो उसे ऊर्जा के क्षेत्र में राहत मिल सकती है, लेकिन इससे सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों में असहजता पैदा होने का खतरा भी बना रहता है।
सऊदी अरब की मदद पर टिकी उम्मीद
पाकिस्तान की सरकार आर्थिक संकट से उबरने के लिए सऊदी अरब से निवेश और वित्तीय सहायता की उम्मीद लगाए बैठी है। हाल के वर्षों में रियाद ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक सहायता और तेल आपूर्ति में राहत दी है। यही कारण है कि पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं के सामने संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
क्षेत्रीय राजनीति में संतुलन की चुनौती
मध्य-पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा लंबे समय से चली आ रही है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए दोनों देशों के साथ रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं है। एक तरफ आर्थिक जरूरतें उसे सऊदी अरब के करीब बनाए रखती हैं, वहीं भौगोलिक और रणनीतिक कारण ईरान से दूरी बनाने की अनुमति भी नहीं देते।
विशेषज्ञों की राय
विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान को अपनी आर्थिक मजबूरियों और क्षेत्रीय हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर इस्लामाबाद किसी एक पक्ष की ओर ज्यादा झुकता है तो दूसरे के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान फिलहाल बेहद सावधानी से कूटनीतिक कदम उठा रहा है।
आगे क्या होगा?
आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान के लिए आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उसे यह तय करना होगा कि वह सऊदी अरब की आर्थिक मदद पर ज्यादा भरोसा करता है या ईरान के साथ रणनीतिक और ऊर्जा सहयोग को प्राथमिकता देता है। फिलहाल इस्लामाबाद दोनों देशों के साथ संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हालात बताते हैं कि यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
Hindustan Awaaz – ताज़ा हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया